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Darul Uloom Deoband: मुस्लिम महिलाओं के बाल कटवाने और आईब्रो बनाने पर जारी हुआ फतवा

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Darul Uloom Deoband: एक सवाल पर जारी हुआ महिला विरोधी फतवा

Darul Uloom Deoband: सदियों बाद देश में अपने समाज की कट्टरता से लड़कर मुस्लिम महिलाओं ने अपनी आवाज उठाने की हिम्मत जुटाई है.

तीन तलाक,बहुविवाह,ज्यादा बच्चे पैदा करना,असाक्षरता जैसी मुस्लिम समाज की कट्टरवादी कुरीति के खिलाफ जाकर महिलाओं ने अपनी ताकत का अहसास भी करा दिया है.
लेकिन कई मुस्लिम धर्मगुरूओं को शायद अपने धर्म की महिलाओं के ये मजबूत हौसलें रास नहीं आ रहे हैं.
दरअसल बीते शनिवार को दारूल उलुम देवबंद ने एक फतवा जारी करते हुए मुस्लिम महिलाओं के बाल काटनेआइब्रो बनवाने पर रोक लगाने का फरमान जारी कर दिया है.
इसके पीछे उन्होंने तर्क दिया कि महिलाओं को ऐसा करने पर इस्लाम में पाबंदी लगाई गई है.
वहीं दिल्ली की रेशमा नकवी ने देवबंद के इस फतवे को बचकाना बताते हुए धर्मगुरू से ये सवाल पूछा है कि मुस्लिम पुरूष रोजाना मदिरा, धूम्रपान का सेवन करते हैं, क्या कभी किसी धर्मगुरू ने उन्हें ऐसा करने से रोकने के लिए कोई फतवा जारी किया है?

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एक सवाल पर ही जारी हो जाते हैं फतवे
Darul Uloom Deoband: जानकारी के अनुसार, सहारनपुर के एक युवक ने दारूल उलुम से यह सवाल किया था कि क्या मुस्लिम महिलाएं को बाल काटने व आइब्रो बनाने की इजाजत है.
बस इतनी सी बात पर दारूल उलुम ने अपने फतवा डिपार्टमेंट ने इस पर फतवा जारी करने को कह दिया.
अब यहां एक सवाल उठना यह भी लाजिमी है कि क्या मुस्लिम धर्मगुरूओं के पास इतना अधिकार है कि वो महिलाओं की स्वतंत्रता के खिलाफ फतवे एक सवाल पर ही जारी कर दें.
जबकि उन्हीं के इस्लाम में तो पुरूषों के लिए भी मदिरा सेवन पर रोक है, लेकिन अभी तक तो पुरूषों के लिए कोई फतवा जारी हुआ हो, ऐसा कभी सुनने में भी नहीं मिला.

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अब और घुटकर जीना नहीं चाहती मुस्लिम महिलाएं
उत्तराखंड की शायरा बानो जैसी दिलेर मुस्लिम महिला को कौन नहीं जानता. तीन तलाक के खिलाफ उनकी दहाड़ से विरोधी भी सहम गए थे. सालों तक लड़ाई लड़ने के बाद आखिरकार उन्होंने उन तमाम मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलाने का काम किया, जो अपने पति द्वारा दिए गए तीन तलाक से पीड़ित थीं
आपको बता दें कि आज भी मुस्लिम समाज में कई ऐसे परिवार हैं जहां बेटियों को न तो पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, और न ही उन्हें आगे बढ़ने का मौक दिया जाता है. ऊपर से धार्मिक बेड़ियों का बोझ, सो अलग.

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बुर्के में क्रिकेट खेलती महिलाओं ने दिया बदलाव का संकेत
हाल ही में हम सब ने जम्मू कश्मीर में मुस्लिम महिलाओं को बुर्के में क्रिकेट खेलते हुए देखा था, जो इस बात की ओर इशारा करता है कि अब आतंक प्रभावित घाटी में भी मुस्लिम महिलाओं ने अपने हक की आवाज बुलंद करना सीख लिया है.
ऐसा नहीं है कि इन महिलाओं को आसानी से अवसर मिल गया हो, निश्चित रूप से इनके सामने भी कई संकट आए होंगे. लेकिन इन्होंने प्रतिकूल माहौल का डटकर सामना किया और उनसे पार पाकर यहां तक पहुंची.
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धर्म और संविधान पुरूष व महिलाओं में भेद नहीं करता
भले ही मुस्लिम धर्मगुरू इस्लाम का हवाला देकर मुस्लिम महिलाओं पर तमाम बंदिशें लागू करते हों, लेकिन हकीकत यह है कि कोई भी धर्म पुरूष और नारी में फर्क नहीं समझता.

सभी धर्मगुरु एक समान नहीं

ऐसा नहीं है कि सभी धर्मगुरू ही इस्लाम की यह परिभाषा बताते हों, कई धर्मगुरू ऐसे भी हैं जो अनुचित धार्मिक कट्टरता को पनपने देना नहीं चाहते. वे समय-समय पर मुस्लिम महिलाओं के पक्ष में भी नजर आते हैं.
मगर इतना तो साफ है कि कोई पक्ष में रहें या न, लेकिन मुस्लिम महिलाओं को एकजुट रहना ही होगा, क्योंकि जो जंग उन्होंने छेड़ी है वो इतनी आसान भी नहीं.
क्योंकि इन बुराइयों की जड़ें बहुत गहरी हैं, उनको उखाड़ने में बहुत समय लगेगा और मेहनत भी.
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