Home देश हिंदू धर्म की आस्था से प्रेरित होकर विदेशी सैलानियों ने बौद्ध गया...

हिंदू धर्म की आस्था से प्रेरित होकर विदेशी सैलानियों ने बौद्ध गया में किया पिंडदान

SHARE
बौद्ध गया
धर्म अलग, संस्कृति अलग, लेकिन आस्था में कोई अंतर नहीं. पितृपक्ष के दिनों में हिंदूओं को अपने पितरों की पूजा करते देखना तो आम बात है, लेकिन जब आँखों के सामने सात समंदर पार से आए विदेशी सैलानी पितृ पूजा करते नजर आएं तो क्या नजारा होगा.
पितरों की मोक्षस्थली के नाम से जानने जाने वाले बौद्ध गया में कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला.
20 विदेशी सैलानियों का एक ग्रुप अमेरिका रूस, यूक्रेन, कनाडा से भारत घूमने आए थे. लेकिन जब इन्होंने यहां हिंदूओं को पितृदान करते देखा तो इसका महत्व जानने की इच्छा जताई .
जब विदेशी सैलानियों को पता चला कि पितृदान से हमारे पूर्वजों की आत्म को शांति मिलती है तो उन्होंने भी अपने पूर्वजों का पिंडदान करने का मन बनाया.
हिंदू धर्म के प्रति आस्था खींच लाई बौद्ध गया
धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं के विपरीत होने के बावजूद केवल आस्था का सिंबल लिये कई देशों के 20 सैलानी बौद्ध गया में पिंडदान करने पहुंचे. जिनमें अमेरिका, रूस, यूक्रेन और कनाडा के मेहमान शामिल हैं.
विदेशी मेहमानों ने पिंडदान में जताई आस्था
विदेशी श्रद्धालुओं ने कहा कि उन्होंने गया में पिंडदान करने से पूर्वजों को मोक्ष मिलने के बारे में काफी कुछ सुना है. इसी से प्रभावित होकर वे यहां आए हैं.
बौद्ध गया
पिंडदान करते हुए विदेश सैलानी
पिंडदानियों में शामिल रूस की क्रिकोव अनतोल्ला ने कहा कि मैं अपने पूर्वज पति, परिवार और देश में शांति के लिए यहां आई हूं. उन्होंने कहा कि गया में पितृपक्ष के दौरान पूर्वजों के मोक्ष के लिए होने वाले पिंडदान और तर्पण के बारे में काफी सुना है. इसने ही मुझे यहां आने के लिए प्रेरित किया.
वहीं, जर्मनी से आयीं अन्ना बैरोन ने कहा कि मेरे परिवार और घर में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है. मैंने सुना है कि पूर्वज नाराज होते हैं तो चारों ओर अशांति फैल जाती है. इसलिए मैं अपने इस दुर्भाज्ञ से छुटकारा पाने के लिए यहां आई हैं.
उन्होंने कहा कि भारत धर्म और आध्यात्म की धरती है और गया आकर उन्हें आंतरिक शांति की अनुभूति हो रही है.
विदेशी सैलानियों को पिंडदान करते देख उमड़े लोग
वैसे श्राध्दों के समय बिहार के बौद्ध गया में पूरे देशभर से लोग अपने पितरों का पिंडदान करने के लिए आते हैं, जिस कारण वहां भीड़ रहती है.
लेकिन जब गुरूवार को फाल्गु नदी के किनारे बैठकर 20 विदेशी सैलानियों ने अपने पितरों का तर्पण किया तो उन्हें देखने के लिए सैकड़ों लोग जुट गए.
विदेशियों को हिंदू परंपराओं के रंग में रंगता वहां मौजूद हर लोगों के लिए एक खास अनुभव था.
पिंडदान का महत्व
मान्यता है कि जो लोग अपना शरीर छोड़कर मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं वे किसी भी लोक में या किसी भी रूप में हों श्राद्ध पखवाड़े में पृथ्वी पर जरूर आते हैं.
हिंदू मान्यताओं के अनुसार, पिंडदान मोक्ष प्राप्ति का एक सहज और सरल मार्ग है. अंत: सलिला फल्गु नदी के तट पर बसे गया में पिंडदान का काफी महत्व है.
आपको बता दें कि इस वर्ष पितृपक्ष मेला 06 सितंबर मंगलवार से शुरू हुआ था और 20 सितंबर तक जारी रहेगा.
इस बार मेले में 10 लाख श्रद्धालुओं के भाग लेने की संभावना जताई गयी है.