Home ह्मयूमन कनेक्शन बंटवारे के बाद से इस दरगाह में मुसलमान नहीं सिख है ख़ादिम

बंटवारे के बाद से इस दरगाह में मुसलमान नहीं सिख है ख़ादिम

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फोटो साभार-बीबीसी
फोटो साभार-बीबीसी
बहुत पुरानी कहावत है कि धर्म कभी आपस में किसी से बैर करना नहीं सिखाता . अगर आप के अंदर मानवता के गुण है तो आपके लिए हर धर्म उतना ही खास है जितना आपका अपना धर्म.
पंजाब के अटारी जिले में बार्डर के निकट राजाताल गांव की कहानी दो धर्मों की आस्था का एक ऐसा केंद्र है जो हर सेक्यूलर लोगों के लिए मिसाल है. राजाताल गांव की खासियत यहां कि एक दरगाह से शुरू होती है. जिसकी देखरेख कोई मुस्लिम नहीं बल्कि सिख धर्म के लोग करते हैं. इस गांव में कोई मुसलमान ना होने के बावजूद भी यहां मुसलमानों के हर त्यौहार को उतनी ही आस्था के साथ मनाते हैं जितना की उनके धर्म में मनाया जाता . इस दरगाह पर आने वालों से लेकर इसकी देखभाल करने वाले हर कोई सिख समुदाय का रहता है.
दरगाह का इतिहास
स्थानीय लोग बताते हैं कि यह दरगाह उस समय की है जब यहाँ मुगल बादशाह जहांगीर की हुकूमत थी. इस दरगाह का निमार्ण तकरीबन 1640 से 1670 के बीच हुआ था. उस समय में इस इलाके में मुगल बादशाह जहांगीर की आरामगाह भी हुआ करती थी जहां वो अपने प्रवासों के दौरान ठहरा करते थे. इस दरगाह को लोग हज़रत सूफी संत खिज़्मत अली शाह और हज़रत इज़मत अली शाह के नाम से जानते हैं. स्थानीय लोगों का मानना है कि ये दोनो सूफी संत भी मुगल बादशाह जहांगीर के दौर में ही राजाताल गांव आए थे. और इन दोनों सूफ़ी संतों की दरगाह का निर्माण भी मुगलों के शासन काल में ही हुआ था. मगर ये कहां से आए थे ये किसी को नहीं पता.
राजाताल के लोग बताते हैं कि 1947 के आस पास ये दरगाह बहुत बुरे हाल में हुआ करती थी. भवन खंडहर हो चुका था और पीरों की कब्रों का भी बुरा हाल था. मगर बंटवारे के बाद जब मुसलमान पाकिस्तान चले गए तो इस गांव के सिखों ने इस दरगाह की देखभाल शुरू कर दी. लोगों का कहना है कि इस गांव के सिखों ने ही आपस में चंदा लगा कर दरगाह का सौन्दर्यकरण किया.
स्थानीय लोगों ने बताया कि बंटवारे से पहले दरगाह के ख़ादिम यानी देखभाल करने वाले मुसलमान हुआ करते थे. और राजाताल में मुस्लमानों की बड़ी आबादी भी हुआ करती थी. मगर 1947 में देश के बंटवारे के बाद गांव के मुसलमान सरहद के उस पार यानी पाकिस्तान चले गए.
बार्डर पार कर लोग आते थे
बीबीसी को दिए अपने इंटरव्यू में राजाताल के बुज़ुर्ग सुब्बा सिंह कहते हैं कि हमारे गांव के पुश्तों से लेकर आज की पीड़ी तक हर किसी की आस्था इस दरगाह में है. सुब्बा सिंह ने बताया कि सरहद पर कंटीले तारों का बाढ़ कुछ सालों पहले ही लगा है. उससे पहले जब तार नहीं थे तब अक्सर लोग दरगाह पर चादर चढाने बार्डर के उस पार से आया करते थे. मगर जब से तारें लगी हैं तब से वहां से लोगों का आना बंद हो गया है.
वहीं दरगाह की संचालन समिति के अध्यक्ष विरासत सिंह बताते हैं कि दरगाह पर स्थानीय लोगों की आस्था का यह हाल है कि इसके सारे रस्म-ओ-रिवाज वैसे ही हैं जैसा मुसलमान किया करते थे. चाहे सालाना उर्स का आयोजन हो या फिर दरगाह के अंदर दुसरे बुज़ुर्गों की कब्रों की देखभाल .
फोटो साभार-बीबीसी
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उन्होंने बताया कि यहां लोग आपस में पैसे जमा करते हैं. हर हफ्ते बुधवार को यहाँ मेला लगता है जिसमे क़व्वालियों, पारम्परिक लोक गीत, सूफी गीत और सामूहिक लंगर का आयोजन किया जाता है.
विरासत सिंह कहते हैं कि आस्था अपने आप में मुकम्मल होती है. हम सिख हैं और अपना मत्था टेकने के लिए गुरुद्वारे भी जाते हैं. मगर इस दरगाह पर भी हमारी आस्था किसी मुसलमान से कम नहीं है. उन्होंने अपनी बात में कहा कि हमारे देश को बाटा गया मगर हमारी आस्था नहीं बट पायी.