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जानें कैसे, एक किसान की बेटी बनी देश की पहली Female Railway Driver

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female railway driver
फोटो साभार-द बेटर इंडिया

Female Railway Driver : अगर मन में काम करने का जुनून हो तो महिलाएं भी हर क्षेत्र में पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अपना दमखम दिखा सकती हैं. बस जरूरत है उस जज्बे की जो उनके क्षमता, ज्ञान और प्रयास को मजबूती प्रदान करें.

कुछ ऐसी ही सोच थी आज से 30 साल पहले सुरेखा यादव की, जिन्होंने देश की पहली female railway driver बनकर यह साबित कर दिया की महिला किसी भी क्षेत्र में पुरूषों से पीछे नहीं रह सकती.
जाने, सुरेखा का रेलसफर
महाराष्ट्र के सितारा जिले में एक किसान घर में जन्मी सुरेखा भारतीय रेलवे की प्रथम female railway driver हैं. सेंट पॉल कॉन्वेंट स्कूल से हाई स्कूल पास करने के बाद सुरेखा ने अपने शिक्षक बनने के सपने को पूरा करने के लिए इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग से डिप्लोमा की पढ़ाई पूरी की.
3 साल बाद जब सुरेखा के हाथों में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग का डिप्लोमा आया तो उन्होंने भी सामान्य छात्रों की तरह नौकरी की तलाश शुरू कर दी. तभी उन्हें एक दिन पता चला की भारतीय रेलवे में सहायक रेल ड्राइवर के पद पर तकनीकि क्षेत्र के डिप्लोमा करने वालों के लिए आवेदन निकला है. एक तकनीकी क्षेत्र की छात्रा होने के नाते सुरेखा ने भी लापरवार रूप से फॉर्म भर कर 1987 में लिखित परीक्षा का प्रयास करने का फैसला किया.
लेकिन उम्मीद ना होने के कारण भी सुरेखा ने पहले ही प्रयास में लिखित परीक्षा को सफलता पूर्वक पास कर लिया.
मौखिक और लिखित परीक्षा को पास करने वाली अकेली लड़की होने के नाते सुरेखा यह समझ चुकी थी की अब इस नौकरी को करना उनके लिए देश, परिवार और खुद के नाम को बनाने का एक बेहतर मौका है.
रेलवे में नौकरी मिलने के बाद सुरेखा ने कभी पीछे मुड़कर नही देखा.
1988 में जब महिलाएं ट्रेन में अकेले सफर करने से हिचकती थी उस समय सुरेखा उपनगरीय ट्रेनों, माल गाड़ियों की ड्राइवर बन उन्हें चलाया करती थी.
अप्रैल 2000 में जब तत्कालिन रेल मंत्री ममता बनर्जी ने ‘देवियों स्पेशल ‘ रेलगाड़ी की शुरूआत की थी तब सुरेखा ने ही पहली मोटरवुमन बनकर उसे चलाया था.
सुरेखा ने बताया कि उनके जिंदगी का सबसे बड़ा चुनौतीपूर्ण समय तब आया जब उन्हें 2010 में पश्चिमी घाट रेलवे लाइन पर एक घाट लोकों पायलट के रूप में चुना गया. मगर तब अधिकारीयों को लगता था कि किसी भी महिला को इतने बड़े काम की जिम्मेदारी देना सही नहीं.
लेकिन उनके इस संदेह के जवाब में सुरेखा ने कहा कि मेरा प्रशिक्षण भी पुरूषों के साथ ही हुआ है और आज अगर मैं यहां हुं तो इसमें कहीं ना कहीं मेरी काबिलियत भी है, जो मुझे आपसे भिन्न करती है.
एशिया स्तर पर मिली पहचान
8 मार्च 2011 को महिला दिवस के मौके पर सुलेखा का नाम पुणे की डेक्कन क्वीन से सीएसटी स्टेशन के बीच ट्रेन चलाने के लिए एशिया की पहली महिला ड्राइवर के रूप में चुना गया था . क्योंकि इन स्टेशनों के बीच की दूरी रेलवे के मुश्किल रेल मार्गों में से एक है.
1 99 0 में महाराष्ट्र सरकार के पुलिस निरीक्षक शंकर यादव से सुरेखा का विवाह संपन्न हुआ था. शादी के बाद जन्में उनके दो बेटे अजिंक्य और अजितेश इस समय इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे हैं.

साभार- द बेटर इंडिया