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असम के एक अनपढ़ रिक्शेवाले ने ग्रामीण बच्चों की पढ़ाई के लिए बनवाए 9 स्कूल

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Illiterate Rikshawpuller Opens School
फोटो साभार - फेसबुक

Illiterate Rikshawpuller Opens School : स्कूल खोलने के लिए बेची अपनी जमीन

Illiterate Rikshawpuller Opens School : जिंदगी में शिक्षा के असली महत्व के बारे में वही अच्छे से बता सकता है जो इससे महरूम रह गया हो.

दुनिया के हर इंसान की यह इच्छा रहती है कि वो पढ़ लिखकर समाज का एक कामयाब हिस्सा बन सके. लेकिन कई बार किन्हीं परिस्थितियों की वजह से हम में से कई लोग चाहते हुए भी पढ़ाई से वंचित रह जाते हैं.
ऐसी ही एक कहानी है असम के रिक्शेवाले की जो खुद अनपढ़ होने का बावजूद शिक्षा की महत्वता को समझा है.
गरीबी ने अहमद अली को शिक्षा से तो महरूम कर दिया था लेकिन वह अपने जीवन के मिशन को फैलाने में जरूर कामयाब हो रहे हैं.
करीमगंज जिले के पाथेरकंडी सर्कल के मधुरबंद गांव के रिक्शाचालक अली बचपन में परिवार की गरीबी की वजह से पढ़ नहीं पाए जिस वजह से उन्हें आज रिक्शा चलाना पड़ रहा है.
मगर अहमद को अपने अनपढ़ होने का दुख बेहद ज्यादा था और इसलिए ही उन्होंने यह तय किया की अब वह अपने गांव के किसी भी बच्चे को अशिक्षित नहीं रहने देंगे.
Illiterate Rikshawpuller Opens School
अहमद अली
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स्कूल के लिए बेची जमीन
बता दें कि पिछले चार दशकों में अहमद ने 9 स्कूलों की स्थापना की है जिसमें से तीन प्राथमिक विद्यालय, पांच मध्य अंग्रेजी विद्यालय और एक उच्च विद्यालय शामिल है.
उन्होंने सबसे पहले 1978 में अपने गांव में खुद की एक जमीन बेचकर और ग्रामीणों की छोटी मात्रा में पैसे इकट्ठा करके एक छोटे स्तर का प्राथमिक विद्यालय स्थापित किया था.
अली का लक्ष्य 10 शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना करना है. वैसे तो वह पहले ही नौ विद्यालय को स्थापित कर चुके हैं, अब बस वो इस क्षेत्र में एक कॉलेज की शुरूआत करना चाहते हैं.
अंग्रेजी वेबसाइट टेलीग्राफ को दिए इंटरव्यूह में अहमद कहते हैं कि अब वो बूढ़ें हो रहे हैं मगर वो अपनी आखिरी सांस तक शिक्षा के माध्यम से अपने गांव को विकसित करना चाहते हैं.
परिवार में अली की दो पत्नियां और सात बच्चे हैं. अपने रिक्शा चलाने को लेकर कोई अफसोस ना रखने वाले अली का मानना है कि प्रत्येक पेशे की अपनी गरिमा होती है और उन्हें खुद पर गर्व है कि वो एक रिक्शा चलाने वाले के नाम से जाने जाते हैं.
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नहीं चाहिए खुद का नाम
हैरानी की बात यह है कि उन्होंने किसी भी स्कूल को अपना नाम नहीं दिया. केवल उच्च विद्यालय का नाम उनके नाम पर है वह भी इसलिए क्योंकि ग्रामीणों ने उन्हें ऐसा करने पर जोर दिया.
अपने गांव और आस-पास के क्षेत्रों में शिक्षा के प्रकाश को फैलाने में उनके जीवन भर के प्रयासों के लिए अली को हाल ही में पार्थिकंडी के विधायक कृष्णुंदु पॉल ने बधाई दी थी.
उनके परोपकारी कामों की प्रशंसा करते हुए पॉल ने कहा कि अली एक खास इंसान हैं. इसके अलावा अल्पसंख्यक मामलों के केंद्रीय मंत्रालय के तहत बहु-क्षेत्रीय विकास कार्यक्रम कोष से अहमद अली हाई स्कूल के विकास के लिए 11 लाख रुपये स्वीकृत की भी घोषणा की है.
फिलहाल अली इनाम मिलने ले ज्यादा इस बात से खुश हैं कि वह अपने बच्चों को शिक्षित करने में सक्षम हैं.
यह बात उनको सुकून देती है कि उनके बनाए गए स्कूलों में ग्रामीणों के बच्चे पढ़ रहे हैं और उनमें से कुछ अच्छी तरह से स्थापित हैं तो कुछ को अच्छी नौकरी भी मिल गई है.