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गांव में पानी के संकट को खत्म करने के लिए, मांड्या का यह किसान बना ‘जलाशय किंग’

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मांड्या
फोटो साभार- डेक्कन हेराल्ड
पिछले कुछ सालों से कर्नाटक के मांड्या जिले के लोग पानी की कमी का सामना कर रहे हैं. बारिश ना होने की वजह से जिले में सूखे की स्थिति बनी हुई है.
जमीन के नीचे के हिस्से में भी पानी का लेवल घटने से बोरेवल के माध्यम से पानी नहीं निकल पा रहा है.
जिले के किसान लगातार खेती और पशुधन को बनाए रखने के लिए सरकार से पानी की मांग कर रहे हैं, मगर हर बार उन्हें कोई ना कोई बहाना बना कर टाल दिया जाता है.
ऐसे समय में, मांड्या के ही एक 78 वर्षीय किसान कमेगौड़ा लगातार 40 साल से क्षेत्र के पानी के संकट को खत्म करने की दिशा में काम कर रहे हैं. आज उन्हीं की मेहनत का नतीजा है कि जिले में सूखे के बावजूद  10 गांवों में  पर्याप्त मात्रा में पानी उपलब्ध है.
कैसे किया पानी का संकट दूर?
किसानों की परेशानी को देखते हुए कमेगौड़ा ने 40 सालों तक कठिन मेहनत करके अपने दम पर गांव में बांध का निर्माण किया.
कमेगौड़ा ने इसके लिए सबसे पहले पहाड़ी से लेकर दशानदानोडी गांव तक खुदाई कर पांच बंधुएं बनाई.
जिससे पहाड़ के बहते हुए पानी को उसकी मुख्य धारा से काटकर उसे संरक्षण के काम में इस्तेमाल किया सके .
इसके लिए उन्होंने पहाड़ के नीचे दो चेक बांध बनाए, जिसे इन बंधुएं से जोड़कर पानी के संरक्षण का काम किया गया.
इंजीनियर की तरह बनाया प्लान
आपको यह जान कर हैरानी होगी कि मांड्या निवासी कमेगौड़ा कभी स्कूल नहीं गए. लेकिन उन्होंने जिस तरह अपनी जल प्रबंधन प्रणाली को लागू किया वो किसी इंजीनियर के दिमाग जैसा ही था.
यह कमेगौड़ा की मेहनत का ही नतीजा है कि आज उनके जल प्रबंधन का लाभ आस-पास के दासनदोडी , पंडितहल्ली, होसोडोडी, तिरुवल्ली और पानाथहल्ली के गांव निवासी भी ले रहे हैं.
प्राकृतिक संसाधन बचाने की है चाहत
कमेगौड़ा ने मांड्या के पहाड़ो का इस्तेमाल सिर्फ पानी के लिए ही नहीं किया बल्कि उन्होंने पहाड़ पर हरियाली लाने का भी कुशल प्रयत्न किया है.
अब तक उन्होंने फूलों वाले पौधों, इमली, हंज और कई अन्य पौधों के साथ-साथ बिल्पपात्र जैसे औषधीय पौधे वहां पर लगा दिए हैं.
इसके अलावा उन्होंने क्षेत्र में वन विभाग द्वारा लगाए गए पौधों का भी ख्याल रखने का खुद ही जिम्मा ले लिया है.
परिवार का नहीं मिला साथ
कमेगौड़ा ने बताया कि उसने अपनी गर्भवती बहू की डिलीवरी के लिए 20,000 रुपये बचाये थे. लेकिन जब बिना किसी खर्च के उसकी बहु की डिलीवरी सरकारी अस्पलात में हो गई, तो उन्होंने वो पैसा बांध बनाने में लगा दिया. और अपने पोते के नाम पर चैक बांध का नाम कृष्णा रख दिया.
उन्होंने बताया कि एक बार जब उन्हें बांध बनवाने में 6 लाख रुपये की जरूरत पड़ी तो उन्होंने बिना किसी संकोच के अपनी भेड़ों और बकरियों को बेच डाला. और साथ ही अपनी पूरी पेंशन भी लगा दी.
जिस कारण आज तक उनका परिवार उनके इस काम से खुश नहीं है.