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विदेशों की नौकरी छोड़ स्वदेश में ही निशुल्क विज्ञान के गुर सिखा रहे शैवाल

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फोटो साभार-ट्वीटर
फोटो साभार-ट्वीटर
जिस दौर में हम अच्छी पढ़ाई लिखाई करने के बाद मोटी कमाई के लिए विदेशों का रूख कर रहें हैं,उसी दौर में उतराखंड के शैवाल कई देशों की नौकरी छोड़कर स्वदेश लौट आए. ताकि वो पढाई से वंचित जरूरतमंद बच्चों का भविष्य संवारने में उनकी मदद कर सके. सूचना प्रौद्योगिकी सेक्टर से जुड़े शैलेश रावत मूल रूप से उतराखंड के कोद्वार जिले के निवासी है. शैवाल जब विदेश से वापस अपने घर लौटे तो उन्होंने सबसे पहले  क्षेत्र के विद्यालयों में जाकर उन जरूरतमंद प्रतिभाओं को तलाशना शुरू किया जो विज्ञान के क्षेत्र में पढ़ लिखकर आगे बढ़ना चाहते हैं, लेकिन आर्थिक तंगहाली की वजह से वो शिक्षा ग्रहण नहीं कर पा रहे. इसी बाधक को कुछ हद तक कम करने का एक छोटा सा प्रयास शैवाल ने किया. वर्तमान में शैवाल 12 जरूरतमंद मेधावियों को निशुल्क विज्ञान के गुर सिखा रहे हैं.
माटी का प्रेम खींच लाया
एक जनवरी 1985 को जन्मे शैवाल की स्नातक तक की शिक्षा कोटद्वार में हुई. 2008 में देहरादून से एमसीए करने के बाद उन्होंने जर्मनी, दुबई, कुवैत, मलेशिया, जापान सहित कई देशों में 2014 तक सेवाएं दीं. विदेश में नौकरी करने के दौरान ही उनके अंदर अपनी माटी में वापस जाकर जरूरतमंद लोगों के लिए शिक्षा के क्षेत्र में कुछ करने का जज्बा पनपने लगा था. शैवाल चाहते तो मोटे पैकेज पर परदेश में ही ऐश कर सकते थे. मगर उन्होंने देश वापस आना ही मुनासिब समझा.
शैवाल के पिता अशोक मोहन रावत व्यापारी हैं, जबकि माता हेमलता गृहणी हैं. उनकी पत्नी रिचा बैंक में कार्यरत हैं. 2014 में स्वदेश वापस लौटने के बाद शैवाल ने कुछ मित्रों के सहयोग से कोटद्वार में डीसेंट बग इन्फोटेक प्रा.लि. के नाम से अपनी कंपनी  की शुरूआत की.  वर्तमान में वह वेबसाइट डेवलप करने के साथ ही ऑनलाइन एजुकेशन भी देते हैं. इसके अलावा वह तकनीकी ज्ञान हासिल कर रहे युवाओं को विज्ञान में पारंगत भी कर रहे हैं. बीते तीन साल में शैवाल पॉलीटेक्निक व बीटेक के सौ से अधिक बच्चों को कोचिंग दे चुके हैं.
शैवाल से विज्ञान की बारीकी सीखने वाले एक छात्र ने बीते माह दिल्ली में आयोजित आईआईटी वर्कशॉप में भाग लिया और रोबोट पर प्रजेंटेशन देकर वाहवाही भी लूटी. वर्तमान में शैवाल लकड़ी के थ्री-डी पेंटिंग प्रोजेक्ट पर कार्य कर रहे हैं.