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Uttarakhand Santa : गरीब बच्चों के सेंटा हैं विजेंद्र, गार्ड की नौकरी से संवार रहे कई भविष्य

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Uttarakhand Santa
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Uttarakhand Santa : पूरा वेतन बच्चों पर करते हैं खर्च

Uttarakhand Santa : लो 25 दिसंबर आ गया, अाज हर घर से कोई न कोई सेंटा बनकर बच्चों को खुशियां बांटने की कोशिश कर रहा होगा.

लेकिन क्या आपको पता है कि देहरादून में एक सेंटा ऐसा भी है जो सिर्फ क्रिसमस-डे पर ही नहीं, बल्कि साल के 365 दिन गरीब बच्चों के लिए सेंटा बनता है.
जी हां, यह एक ऐसा सेंटा है जो बच्चों को खुश करने के लिए क्रिसमस डे या किसी अन्य त्यौहार का इंतजार नहीं करता बल्कि पूरे साल यह गरीब बच्चों के जरूरत अनुसार उन्हें उपहार देता है.
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बच्चों को शिक्षा भी देता है सेंटा  
बैंक में गार्ड की नौकरी में कार्यरत विजेंद्र अपनी ड्यूटी पूरी करने के बाद शाम को क्षेत्र की मलिन बस्तियों के गरीब बच्चों को दो घंटे की ट्यूशन क्लास देते हैं.
कक्षा में बच्चों को सभी विषय पढ़ाए जाते हैं. साथ ही बच्चों की भीतरी प्रतिभा को बाहर निकालने के लिए समय-समय पर खेलडांससामान्य ज्ञान प्रतियोगिता का आयोजन भी कराते हैं.
विजेंद्र सिंह अपनी कक्षा के बच्चों को अपने बच्चों की तरह प्यार करते हैं और उनकी हर जरूरत को भी पूरा करते हैं.
पूरा वेतन बच्चों पर करते हैं खर्च
जिस भी बच्चे को कॉपी-पेंसिल की जरूरत होती हैवह निसंकोच गार्ड अंकल से हक से कहता है और फिर गार्ड अंकल कुछ मिनटों के अंदर ही उनकी मंगाई हुई चीज को उनके हाथों में रख देते हैं.
विजेंद्र सिंह को बैंक से 6000 रुपये मिलते हैंवह सब पैसे बच्चों की सेवा में लगा देते हैं. विजेंद्र कहते हैं कि उनके परिवार का गुजारा करने के लिए सेना की पेंशन पर्याप्त है.
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सेना से रिटायर्ड हैं विजेंद्र
विजेंद्र सिंह गढ़वाल राइफल से 10 साल पहले रिटायर्ड हो चुके हैं. इसके बाद उन्होंने खाली बैठने से अच्छा बैंक में गार्ड की नौकरी करने की सोची.
तीन वर्ष पूर्व जब उन्होंने देहरादून की सड़कों पर कबाड़ बीनते बच्चों को देखा तो उन्हें बड़ा दुख हुआ.
उन्होंने जब उऩ बच्चों से पूछा कि तुम स्कूल क्यों नहीं जाते हो, क्या तुम्हें मालूम नहीं कि कबाड़ बीनकर भविष्य नहीं बनता. इसके बाद जो बच्चों ने जवाब दिया वह विजेंद्र सिंह के दिल में घर गया.
उन बच्चों का जवाब था कि कूड़ा नहीं बीनेंगे तो घर का खर्चा क्या आप चलाओगे. वैसे भी मां-बाप के पास पढ़ाने के लिए पैसे नहीं है.
इस वाक्ये के बाद उन्हें गरीब बच्चों को पढ़ाने की प्रेरणा मिली जो आर्थिक तंगी के कारण स्कूल नहीं जा पाते हैं.
इसके बाद से विजेंद्र ने 15 बच्चों को पढ़ाने का जिम्मा उठाया.

 

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