जानें वो पौराणिक महत्व जिस वजह से हम सबको जरूर जाना चाहिए कुंभ

Sadhu Akhara In Kumbh
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Kumbh Mela History : कुम्भ 525 BC में प्रारम्भ हुआ था और आज भी इसकी इतनी ही मान्यता है.

Kumbh Mela History : बचपन से हर किसी ने  अपने बड़े बुजुर्गों या पिर किताबों में कुंभ मेले के बारे में कुछ न कुछ जरूर सुना होगा.

हो सकता है आप में से कई लोगों को इस भव्य मेले में जाने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ होगा लेकिन क्या आप कुम्भ के मेले के पीछे का इतिहास जानते हैं ? 
कहा जाता है कि कुम्भ 525 BC में प्रारम्भ हुआ था और आज भी इसकी इतनी ही मान्यता है जितनी उस समय में थी.
अब ऐसे में एक सवाल आज की जनरेशन के दिमाग में जरूर आता होगा कि आखिर कुम्भ की शुरुआत किस वजह से करी गयी थी ? 
दरअसल कुम्भ के शुरू होने के पीछे वैसे तो कई पौराणिक मान्यताएं हैं लेकिन सबसे प्रचलित यह है कि एक बार भगवान इंद्र ने महर्षि दुर्वासा को रास्ते में मिलने पर जब प्रणाम किया तो दुर्वासाजी ने प्रसन्न होकर उन्हें अपनी माला दे दी.
लेकिन इन्द्र ने उस माला का आदर न कर अपने ऐरावत हाथी के मस्तक पर डाल दिया, जिसने माला को सूंड से घसीटकर पैरों से कुचल डाला.
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इस पर दुर्वासाजी ने क्रोधित होकर इन्द्र की ताकत खत्म करने का श्राप दे दिया. तब इंद्र अपनी ताकत हासिल करने के लिए भगवान ब्रह्मा और भगवान शिव के पास गए, जिन्होंने उन्हें विष्णु भगवान की प्रार्थना करने की सलाह दी.
तब भगवान विष्णु ने क्षीरसागर का मंथन करके अमृत निकालने की सलाह दी, भगवान विष्णु के ऐसा कहने पर संपूर्ण देवता दैत्यों के साथ संधि करके अमृत निकालने के यत्न में लग गए.
समुद्र मंथन की सांकेतिक चित्र   
समुद्र मंथन के लिए मंदराचल पर्वत को मथानी और नागराज वासु  को रस्सी बनाया गया.
जिसके फलस्वरूप क्षीरसागर से पारिजात, ऐरावत हाथी, उश्चैश्रवा घोड़ा, रम्भा, कल्पबृक्ष शंख, गदा, धनुष, कौस्तुभमणि, चन्द्र मद, कामधेनु और अमृत कलश लिए धन्वन्तरि निकलें.
सबसे पहले मंथन में विष उत्पन्न हुआ जो कि भगवान् शिव द्वारा ग्रहण किया गया जैसे ही मंथन से अमृत दिखाई पड़ा तो देवता, शैतानों के गलत इरादे समझ गए.
फिर देवताओं के इशारे पर इंद्रअमृत-कलश को लेकर आकाश में उड़ गए.समझौते के अनुसार उनका हिस्सा उनको नहीं दिया गया तब राक्षसों और देवताओं में 12 दिनों और 12 रातों तक युद्ध होता रहा.
इस तरह लड़ते-लड़ते अमृत पात्र से अमृत चार अलग-अलग स्थानों पर गिर गया, जिन स्थानो पर अमृत गिरा वो स्थान थे –  प्रयागराज, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन.
तब से, यह माना गया है कि इन स्थानों पर रहस्यमय शक्तियां हैं, और इसलिए इन स्थानों पर कुंभ मेला लगता है.
12 दिन चली देवताओं की लड़ाई को इंसानों के 12 साल के बराबर माना गया है और इसी कारण 12 साल में एक बार कुम्भ का आयोजन होता है.. 
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वहीं इन जगहों पर हर 6 साल में एक अर्धकुंभ भी लगता है, जो की 2019 में प्रयागराज में सगने वाला है.
जानिये 4 अलग-अलग जगह पर लगने वाले कुम्भ का महत्व 
Kumbh Mela History
हरिद्वार कुंभ
हरिद्वार 
यहां  का सम्ब्नध मेष राशि से है और हरिद्वार उत्तराखंड का वो भाग है जहां जाए बिना किसी  श्रद्धालु की तीर्थ यात्रा पूरी नहीं होती. यहां मां गंगा के तट पर कुंभ का आयोजन किया जाता है 
Kumbh Mela History
प्रयागराज कुंभ
प्रयागराज
यहां लगने वाला कुंभ सबसे अधिक महत्व रखता है और इसी साल 2019 में कुम्भ/अर्धकुंभ का मेला यहीं लगेगा.  इस साल 15 जनवरी से लेकर यह मेला 4 मार्च तक चलेगा. ब
बता दें कि प्रयागराज में गंगा,यमुना और सरस्वति के संगम  पर कुंभ का आयोजन होता है
नासिक कुंभ
नासिक 
ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार नासिक उन चार स्थानों में से एक है, जहां अमृत कलश से अमृत की कुछ बूंदें गिरी थीं. इसी कारण कुम्भ में नासिक को काफी मान्यता दी गयी है. 
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वहीं नासिक में गोदावरी नदी के किनारे कुम्भ का मेला लगता है.
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उज्जैन कुंभ
उज्जैन 
शास्त्र के अनुसार शून्य अंश (डिग्री) उज्जैन से शुरू होता है और उज्जैन का अर्थ है विजय नगरी.
माना जाता है की भगवन शिव नें त्रिपुरा राक्षस का वध उज्जैन में ही किया था,और यहां 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक महाकाल भी है.
गौरतलब है की उज्जैन में शिप्रा नदी के तट पर कुंभ आयोजित होता.

 कुंभ में लाखों की तादात में हर साल साधु संत आते हैं और लोगों को आशीर्वाद देते हैं,

कहा जाता है कि यदि कोई सच्चा संत दिल से आपको कुम्भ में दुआ देदे तो उसको पूरे होने से कोई नहीं रोक सकता.