Good Samaritans India : हैदराबाद के बेसहारा बुजुर्गों के लिए श्रवण कुमार है ये आदमी

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फोटो साभार- फेसबुक

Good Samaritans India : संस्था के फाउंडर जॉर्ज राकेश बाबू हैं

Good Samaritans India : आपने अक्सर बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, सड़क किनारे बेसहारा, असहाय बुर्जगों को भीख मांगते हुए जरूर देखा होगा.

जिंदगी के आखिर वक्त में भीख मांगते हुए इन बेसहारा बुजुर्गों को देखकर आपके मन में यह सवाल जरूर आता होगा कि वो कौन लोग हैं जिन्होंने इन बुजुर्गों को ऐसी हालात में मरने के लिए छोड़ दिया है.
हैदराबाद में ऐसे ही लोगों के लिए सहारा बनकर काम कर रही एक गैर सरकारी एनजीओ ‘गुड स्मार्टियन इंडिया’. जो ना सिर्फ सड़क किनारे जिंदगी गुजार रहे इन बुजुर्गों को सहारा देती हैं बल्कि उनका इलाज भी करती है.
संस्था के फाउंडर जॉर्ज राकेश बाबू ने मार्च 2011 में अपने सह-संस्थापक सुनीता जॉर्ज और यसुकला के साथ मिलकर औपचारिक तौर पर ‘गुड स्मार्टियन इंडिया’ नाम से एक ट्रस्ट रजिस्टर करवाया था.
जिसका मुख्य उद्देश्य बेसहारा बुजुर्गों के लिए बुनियादी देखभाल प्रदान करना है. ये ट्रस्ट चिकित्सकीय प्रशिक्षित व्यक्तियों का एक बहुत छोटा समूह है जो बुजुर्गों की निशुल्क देखभाल संबंधित सभी काम करता है .
शुरूआत एक छोटे से क्लीनिक से की
इवेंट मैनेजर से सामुदायिक डॉक्टर बने जॉर्ज राकेश बाबू ने सड़क पर पड़े बीमार बुजर्गों की मदद करने के लिए जब ठानी तो उन्होंने इसकी शुरूआत एक छोटे से क्लीनिक खोलकर की.
इस ट्रस्ट के लोगों ने बिना किसी पैसों के 300 से अधिक उन बीमार बुजुर्गों व बेसहारा लोगों की मदद की है जिन्हें सड़क पर मरने के लिए अपनों द्वारा छोड़ दिया गया था.
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ये लोग घावों पर पट्टी बांधने से लेकर बुजुर्गों के डायपर बदलने तक सभी काम करते हैं . यही नहीं ये लोग उन सभी के लिए खाना भी बनाते हैं.
जॉर्ज राकेश बाबू द्वारा शुरू की गई इस एक पहल ने ही आज 300 से ज्यादा बुजुर्गों को एक सम्मानजनक जिंदगी फिर से जीने के लिए दी है.

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एक तमिल पुजारी की गुमनाम मौत ने दी प्रेरणा
दरअसल जॉर्ज के अंदर यह सेवा भाव की भावना जगाने का काम एक तमिल पुजारी की गुमनाम मौत ने किया.
इस पुजारी को जॉर्ज कई वर्षों से जानते थे, जिस वजह से उनका पुजारी से एक अलग लगाव बन चुका था.
यह पुजारी बच्चों के लिए एक अनाथालय चलाया करते थे. जॉर्ज के मुताबिक बुजुर्ग पुजारी के पास अनाथालय चलाने के लिए पैसों का कोई उचित प्रबंध नहीं था. जिस वजह से उन्हें इसे चलाने में कई बाधाओं का सामना करना पड़ता था.
एक बार जिस बिल्डिंग में अनाथालय बना था उसी के मालिक ने पुजारी से रेंट देने की मांग कर दी.
पुजारी ने इसके लिए कुछ और समय मांगा लेकिन मकान मालिक ने पुजारी की एक भी बात नहीं सुनी और उन्हें तुरंत किराया देने या सभी 60 बच्चों के साथ घर छोड़ने के लिए कह दिया.
ये सब देखकर जॉर्ज को बहुत धक्का लगा कि जिस आदमी ने अनाथों के लिए अपने पूरे जीवन को समर्पित कर दिया आज उसे ही अपमान का घूंट पीना पड़ रहा है.
इसके बाद जॉर्ज ने कुछ अन्य लोगों के साथ मिलकर सभी बच्चों को शहर के दूसरे अनाथालय में भिजवाने का इंतजाम किया.

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साथ ही जॉर्ज ने पुजारी से कहा कि वह उन्हें जल्द ही अपने घर के सामने रहने के लिए ले आएंगे. जिसका किराया जार्ज खुद भरना चाहते थे.
जॉर्ज बताते हैं कि कुछ दिनों के बाद जब उन्होंने एक जगह किराए पर ली तब वो कई बार पुजारी को फोन किया कि वो उन्हें अनाथालय से लेने आ रहे हैं. मगर उन्होंने तब कोई जवाब नहीं दिया.
इसके बाद जब उन्होंने केयरटेकर लड़के को फोन किया तो पता चला कि मकान मालिक ने पिता (पुजारी) से कहा है कि वह अपना सामान पैक करें और सुबह ही यहां से चले जाएं.
लड़के ने बाद में बताया की पुजारी जी अपना सामान पैक करने के बाद अनाथालय के बाहर कई समय तक कुर्सी पर उनका इंतजार किया.
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और कुछ समय बाद कुर्सी पर बैठे हुए ही अचानक से पुजारी का स्वास्थ्य बिगड़ना शुरू हो गया था. जिसके बाद उस लड़के ने पुजारी को अपने रिश्तेदार के घर में रखने का फैसला किया.
जार्ज बताते हैं कि जब तक वो पुजारी के पास पहुंचे तब तक उनकी धड़कनें रुक चुकी थीं और वो हमेशा के लिए इस दुनिया को छोड़कर चा चुके थे.
जॉर्ज ने कहा कि जब पुजारी के शरीर को मिट्टी में दफन किया जा रहा था तो करीब 50 बच्चे उनकी मृत शरीर के पास खड़े होकर रो- चिल्ला रहे थे, ये वही बच्चे थे जिन्हें पुजारी ने जीवन दिया था.
जार्ज ने कहा कि पुजारी की मौत के बाद एक बार फिर से यह बच्चे अनाथ हो गए थे.
जार्ज बताते हैं कि उस दिन उन्होंने यह फैसला कर लिया कि अब से वो किसी भी व्यक्ति को जो अकेला छोड़ दिया गया है उसे अज्ञात मृत्यु नहीं मरने देंगे.
उन्होंने कहा कि इस धरती पर हर व्यक्ति को अपने आखिरी दिनों में पूर्ण जीवन जीने और एक सम्मानजनक मृत्यु का भी अधिकार है.
यह सच है कि पुजारी की मौत ने जॉर्ज को झकझोर कर रख दिया था लेकिन उन्हें जीवन जीने का सलीका भी सिखा गई.

 

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