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Indian Brick Worker: आखिर क्यों ईंट बनाने वाले मजदूर जिल्लत की जिंदगी जीने को हैं मजबूर

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Indian Brick Worker: एनजीओ ने जारी की चौंकानी वाली रिपोर्ट

Indian Brick Worker: हाल ही में पंजाब की एक गैर सरकारी संस्था एंटी स्लेवरी इंटरनेशनल के द्वारा किए गए अध्ययन में यह पता चला है कि भारत में ईंट बनाने वाले मजदूरों की स्थिति काफी चिंताजनक है.

इन मजदूरों के साथ भट्टा मालिक द्वारा धोखेबाजी करना, उनके हक के पैसे मारने जैसे मामले आम है. जिसकी वजह से इनकी आर्थिक स्थिति कभी मजबूत नहीं बन पाती है.
बंधुआ मजदूरों की तरह जिंदगी जीने को हैं मजबूर
Indian Brick Worker: रिपोर्ट के अनुसार भारत में फिलहाल 10 हजार ईंट की भट्टियों में करीब 1 करोड़ मजदूर ईंट बनाने का काम करते हैं. जिन्हें उनकी ईंट बनाने की संख्या के हिसाब से पैसे दिए जाते हैं.
आपको बता दें कि हर समय धूल, मिट्टी, भठ्ठी की गर्मी झेलने वाले ये मजदूर कुछ चंद पैसे और कमाने की लालच में अपने बच्चों को भी इसी जंजाल में लाकर फंसा देते हैं.
इनविसबल चैन नाम की एक किताब के मुताबिक 65 से 80 प्रतिशत बाल मजदूर गर्मियों में नौ-नौ घंटे तक यह काम करते हैं.
एनजीओ ने बताया कि तमाम कोशिशों के बावजूद भी हम इन लोगों को नहीं बचा पाते. क्योंकि इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है कि साल के 6 महीने में तो वो कहीं भी काम ढ़ूंढ कर कमा लेते हैं. लेकिन दूसरे छमाही में मजबूरी में उन्हें भठ्ठी के काम में वापस लौटना पड़ता है.
क्या कहता है कानून ?
वैसे तो भारत में बंधुआ मजदूरी कानूनी तौर पर बैन है. लेकिन अपने फायदे के लिए ठेकेदार इसके बनाए नियमों को ताक पर रखकर काम कराते हैं.
ईंट के भट्टे पर काम करने वाली 32 साल की नोहार बताती हैं कि उन्हें पांच महीने तक दिन रात काम कराने के बावजूद भी ना के बराबर पैसा दिया जाता है.
उन्होंने बताया कि वो अपने पति के साथ मिलकर पूरे दिन भर में करीब 1400 ईंट बनाती है.
ऐसी ही एक और मजदूर रिंकी ने अपनी पीड़ा बताते हुए कहा कि उनके मालिक के ऊपर उनका 32000 का बकाया है जिसे उसने अभी तक नहीं दिया है.
उन्होंने कहा कि इसके बावजूद भी वो वहां फिर से नहीं लौटना चाहती. क्योंकि वो वापस ऐसी जगह नहीं जाना चाहतीे साथ नौकरों से भी बदत्तर व्यवहार किया गया है.
क्या है सरकार का रवैया ?
 पंजाब के श्रम आयुक्त तेजिंदर सिंह का इस बारे में कहना है कि इन मजदूरों की स्थिति इतनी भी खराब नहीं है जितनी की बताई जाती है.
उन्होंने कहा कि अगर उनके सामने इससे जुड़ा कोई भी मामला संज्ञान में आता है तो वह हर बार इस पर अमल करते हैं. इसके अलावा स्थिति पर नजर बनाए रखने के लिए समय समय पर उनके विभाग द्वारा सर्वे भी करवाया जाता है ताकि नियमों का उलंघन ना हो.
वहीं दूसरी तरफ आंकड़े बताते हैं 90 प्रतिशत ईंट मजदूरों के पास पीने को साफ पानी तक उपलब्ध नहीं है. रात गुजारने के लिए इन लोगों को 22 और लोगों के साथ एक छोटे से कमरे में बंद कर दिया जाता है.
एंटी स्लेवरी इंटरनेशनल के निदेशक जय सिंह बताते हैं कि 21वीं शताब्दी में रहकर यह जरूरी हो गया है कि सरकार इन मजदूरों की भी जरूरत समझे.
उन्होंने कहा कि सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि श्रमिकों को नियमित रूप से न्यूनतम मजदूरी दी जाती है या नहीं.
इसके अलावा मासूम बच्चों का बचपन छीनने वाले लोगों की भी पहचान कर उन्हें सजा दी जानी चाहिए.
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