Home एनजीओ समाचार आईवीएफ की तकनीक से भारत में जन्मा देश का पहला ‘टेस्ट ट्यूब...

आईवीएफ की तकनीक से भारत में जन्मा देश का पहला ‘टेस्ट ट्यूब बछड़ा’

SHARE
फोटो साभार-बीबीसी
फोटो साभार-बीबीसी
पुणे के पास इंदापुर गांव में माजिद ख़ान पठान के घर पर इन दिनों खुशियों का माहौल बना हुआ है. उनके घर पर आने वाला हर कोई उन्हें परिवार में जन्मे नए मेहमान की शुभकामनाएं दे रहा हैं. माजिद खान के घर पर देश का पहला मोबाइल लैब तकनीक की मदद से टेस्ट ट्यूब बछड़ा पैदा हुआ है. एक एनजीओ की कोशिशों के जरिए आईवीएफ तकनीक के माध्यम से इस बछडे़ का जन्म हुआ है.
विरासत में मिली है गौसेवा
पुणे के पास इंदापुर गांव में माजिद ख़ान पठान वर्षो से रहते हैं. सालों से पठान परिवार इसी गांव में रचना काऊ फार्म चलाते हैं.
माजिद कहते हैं गौसेवा उनको माता-पिता से विरासत में मिली है. इस समय इनके काउ फार्म में देसी नस्लों की 100 से ज्यादा गायें है और हर गायें रोजाना 10 लीटर तक दूध देती है. वहीं उनके पास गिर नस्ल की भी कई गायें हैं, जो औसतन बीस लीटर या उससे अधिक दूध देती हैं. इन गायों की देखरेख परिवार के सदस्यों की तरह होती है.
आईवीएफ का क्यों लिया सहारा
माजिद का मानना है कि आज अगर देश में ज्यादा दूध देने वाली भारतीय देसी गायों की नस्लों को बचाना है तो आईवीएफ की तकनीक को अपनाना होगा. उन्होंने कहा कि हमने भी यह फैसला इसलिए लिया क्योंकि एक गाय अपनी उम्र में ज्यादा से ज्यादा दस से बारह बच्चों को जन्म दे सकती है.
वहीं आईवीएफ के जरिये हम उसी गाय से सरोगसी के इस्तेमाल से उम्रभर में 200 बच्चे पैदा करा सकते हैं, वो भी बिना गाय को नुकसान पहुंचाए.
कैसे हुआ इस तकनीक का इस्तेमाल
पठान परिवार के रचना काऊ फार्म से रतन नामक गाय के इम्मैच्युअर एग्स को सबसे पहले उसके गर्भाशय से अलग किया गया . फिर उसे मोबाइल लैब की विशेष इन्क्यूबेटर में रखा गया, जिसने गाय के कृत्रिम गर्भ जैसा काम किया. उसके पास इस इन्क्यूबेटर में ही गिर नस्ल के एक बैल से प्राप्त वीर्य से उसे ख़ास तापमान पर फलित किया गया.
माजिद ने बताया कि उन्हें पहले उम्मीद नहीं थी की इस तकनीक से उनकी गायें बछड़ा दे पाएगी.
इस तकनीक को सफल बनाने में जेके ट्रस्ट के अध्यक्ष डॉ विजयपत सिंघानिया की एनजीओ का बहुत बड़ा रोल है. वहीं इस ट्रस्ट के सीईओ पशु चिकित्सक और वैज्ञानिक डॉक्टर श्याम झँवर हैं .
एक मोबाइल लैब की कीमत 1 करोड़
1974 में पशुचिकित्सा शास्त्र में ग्रेजुएट डॉ झँवर ने भेड़, बकरियों और गौवंश में भ्रूण प्रत्यारोपण (एम्ब्रायो ट्रांसफर) पर शोध पत्र लिख कर इस विषय पर देश की पहली पीएचडी पूरी की.
डॉ झँवर ने बताया की आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू को हमने अपनी प्रेजेंटेशन दी है जिसके बाद आंध्र विश्वविद्यालय ने हमें तिरुपति के पास 33 इंच ऊंचाई वाली गाय की नस्ल ‘पुंगनूर‘ की तादाद भी आईवीएफ मोबाइल लैब तकनीक से बढ़ाने का काम लिया है. जो दुनिया में गाय की सबसे छोटी नस्लों में से एक है.
डॉ झंवर बताते हैं कि ट्रस्ट के पास चार आईवीएफ मोबाइल लैब हैं, जिनमें हरेक की लागत करीब एक करोड़ रुपये है.
डॉ विजयपत सिंघानिया की एनजीओ की मदद से जन्मे इस बछड़े का नाम माजिद ने ‘विजय’ रखा है.

साभार- बीबीसी