सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद एक झटके में बेघर हो गए 10 लाख आदिवासी

Supreme Court Tribals Eviction Order
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Supreme Court Tribals Eviction Order : जंगल में रहने वाले लोगों को कोर्ट ने हटाये जाने का आदेश दे दिया है.

Supreme Court Tribals Eviction Order : देश के लगभग 16 राज्यों के 10 लाख से भी ज्यादा आदिवासियों और जंगल में रहने वाले अन्य लोगों को सुप्रीम कोर्ट ने जंगल की जमीन से हटाये जाने का आदेश दे दिया है.

दरअसल कुछ साल पहले वन्यजीव समूह के द्वारा एक याचिका दायर की गयी थी जिसमें वन अधिकार अधिनियम की वैधता पर सवाल उठाया गया था, बताया जा रहा है कि अदालत का ये फैसला उसी याचिका के संबंध में आया है.
बताते चलें कि इस याचिका में यूपीए के पहले कार्यकाल के दौरान पास किए गए वन संरक्षण अधिनियम (2006) को चुनौती दी गई है.
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इस याचिका में सरकार ने पारम्परिक वनवासियों को उनके गाँव की सीमाओं के अंदर जंगलों तक पहुँचने, प्रबंधन और शासन करने का अधिकार दिया था.
सरकार का ये आदेश राजनीतिक रूप से विवादास्पद माना जा रहा है. ज्ञात रहे कि इससे पहले 14 फरवरी को, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस मामले में भाजपा पर आरोप लगाते हुए कहा था कि,”भाजपा सुप्रीम कोर्ट में मूक दर्शक बनी हुई है, जहां वन अधिकार कानून को चुनौती दी जा रही है.
वह लाखों आदिवासियों और गरीब किसानों को जंगलों से बाहर निकालने के अपने इरादे का संकेत दे रही है. कांग्रेस हमारे वंचित भाई-बहनों के साथ खड़ी है और इस अन्याय के खिलाफ पूरे दम से लड़ाई लड़ेगी.”
याचिकाकर्ताओं ने यह भी मांग उठाई है कि, उन सभी लोगों के जिनके पारंपरिक वनभूमि पर दावे कानून के तहत खारिज हो जाते हैं, उन्हें राज्य सरकारों द्वारा निष्कासित कर दिया जाना चाहिए.
बताया जा रहा है कि इस कानून के बचाव के लिए केंद्र सरकार ने जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस नवीन सिन्हा और जस्टिस इंदिरा की पीठ के समक्ष 13 फरवरी को अपने वकीलों को ही नहीं भेजा.
इसी वजह से पीठ ने राज्यों को आदेश दे दिया कि वे 27 जुलाई 2019 तक उन सभी आदिवासियों को बेदखल कर दें जिनके दावे खारिज हो गए हैं.
अदालत ने अपना फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कहा है कि, “राज्य सरकारें इस बात को सुनिश्चित करेंगी कि जहां दावे खारिज करने के आदेश पारित कर दिए गए हैं, वहां सुनवाई की अगली तारीख को या उससे पहले आदिवासियों का निष्कासन शुरू कर दिया जाएगा.
वहीं अगर उनका निष्कासन शुरू नहीं होता है तो अदालत उस मामले को गंभीरता से लेगी.बता दें की मामले की अगली सुनवाई की तारीख 27 जुलाई है.
इस बारे में जब आदिवासी और वन-निवासियों के अधिकारों के लिए लड़ने वाली मार्क्सिस्ट कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई-एम) नेता वृंदा करात से बात की गयी तो उन्होंने कहा कि हमनें इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री को पत्र लिखा है और उनसे इस मामले में तुरंत अध्यादेश लाने की अपील की है.
वृंदा करात आगे बताती हैं कि, “सरकार ने आदिवासियों को धोखा दिया है. यह हैरान कर देने वाली बात है कि सरकार ने पिछले एक साल से इस मामले में कोर्ट में कोई लड़ाई नहीं लड़ी और सबसे महत्वपूर्ण दिन 13 फरवरी को भी इसके लिए सरकार की तरफ से कोर्ट में कोई वकील पेश नहीं हुआ. इससे पता चलता है कि सरकार आदिवासियों के अधिकारों के प्रति कितनी गंभीर है.” 
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इस फैसले का हो रहा है जमकर विरोध
हालाँकि कोर्ट के इस फैसले का देश की कई जगहों पर जमकर विरोध भी हो रहा है. इस फैसले के विरोध में झारखंड में झामुमो, माले, माकपा और झारखंड वनाधिकार मंच ने कहा कि ये भाजपा की केंद्र सरकार द्वारा आदिवासियों पर एक बड़ा हमला है.
झामुमो के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन ने भी इस बात में सहमती जताते हुए कहा कि, “11 लाख आदिवासियों को जल, जंगल, जमीन से बेदखल किया जा रहा और आदिवासी विरोधी भाजपा सरकार मूक दर्शक बनी बैठी है.”