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विश्व में जिंदा ही नहीं मरे लोगों की dead body भी बन गई है दिक्कत

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आपने जिंदा लोगों से होने वाली दिक्कत के बारे में तो सुना होगा, मगर क्या आपको पता है की हमारी धरती पर मरे चुके लोगों की dead body भी एक गंभीर परेशानी बन चुकी है.
आपको बता दें कि पूरे विश्व में लाशों का बोझ इस कदर बढ़ता जा रहा है कि आज बहुत से शहरों में नई dead body को दफ़नाने के लिए जगह ही नहीं बची है.
जिन लोगों के प्राण उनके शरीर को छोड़कर निकल गए हैं, उनका क्या करें? कहां दफ़नाएं? कैसे जलाएं? अस्थियां कहां रखें? इस सवाल से आज पूरी दुनिया परेशान हैं.
दिल्ली , लंदन, न्यूयॉर्क, येरुशलम, सिंगापुर, लाहौर या फिर कोई और बड़ा शहर सब का यही हाल है.
हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा था कि जिस तरह क़ब्रिस्तानों और श्मशानों का विस्तार हो रहा है, उसे देखते हुए तो कुछ साल बाद लोगों के रहने के लिए ही जगह समाप्त हो जाएगी.
अब तो हाल ये हो गया है कि कुछ देशों ने dead body को दफनाने की किल्लत को देखते हुए पुरानी क़ब्रें खोदकर उनकी जगह नई लाशें दफनाना शुरू कर दिया है.
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यूरोप में जमीन से वापस निकाली जा रही अस्थियां
बीबीसी की रेडियो सिरीज़ ‘द इनक्वायरी’ के मुताबिक कई यूरोपीय देशों में क़ब्र के लिए ज़मीन इतनी महंगी हो गई है कि लोग ज़मीन से अस्थियां निकालकर उन्हें बड़े गड्ढों में जमा कर रहे हैं.
ये बिल्कुल सत्य है कि धरती पर सिर्फ इंसान ही है जो अपने मर चुके दोस्त रिश्तेदारों का भी सम्मान के साथ अंतिम विदाई करता है.
आपको ये जानकार हैरानी होगी आज की तारीख़ में हर ज़िंदा इंसान के मुकाबले 30 लाशें धरती पर मौजूद हैं. और इसी का नतीजा है कि ग्रीस जैसे छोटे देश में अपनों को दफ़नाने के लिए लोगों के पास जगह तक नहीं बची.
मुर्दों की बढ़ती आबादी के कारण ग्रीस में पुराने क़ब्रिस्तानों को खोदकर, उसमें से हड्डियां निकालकर, नए मुर्दों के लिए जगह बनाई जा रही है.
यही नहीं अपने अच्छे शहरी मैनेजमेंट के नाम से पहचान बना चुका हांगकांग भी क़ब्रिस्तान के लिए कम पड़ती जगह से परेशान है.
गौरतलब है कि चीन के लोगों के बीच अपने पुरखों साथ वक़्त बिताने का चलन है. इसी को देखते हुए हांगकांग में चुंग यूंग नाम का त्यौहार मनाया जाता है.
जिसमें लोग खाने-पीने का सामान बनाकर अपने पुरखों के कब्र पर जाकर उन्हें चढ़ाते हैं. वहां के लोगों के बीच मान्यता है कि ये सामान मर चुके उनके पूर्वजों को मिल जाता है. जो दूसरी दुनिया में उनके काम आता है.
अब जिस देश में रहने के लिए जगह इतनी मुश्किल से मिलती हो, वहां मुर्दे दफन करने की जगह का इंतज़ाम करना ही अपने आप में चुनौती है.
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ईसाइयों में क्यों शुरू हुआ लाशों को जलाना?
ज़मीन की कमी की वजह से ही ईसाइयों में भी शवों को जलाने का चलन शुरू हुआ .
हालांकि शुरूआत में चर्च और धार्मिक गुरू इसके ख़िलाफ़ थे. लेकिन धीरे धीरे हालात को समझते हुए उन्होंने भी इसे अपनी मंजूरी दे दी.
निदरलैंड का डिजीटल तरीका
मुर्दों के प्रति अपने लगाव और पूरानी परंपराओं को बरकार रखने के लिए नीदरलैंड ने डिजिटल क़ब्रिस्तान बनाने की योजना शुरू की है. इस योजना के तहत मरने वाले लोगों के परिजनों को एक डिजिटल कोड दिया जाता है.
इस कोड के ज़रिए परिजन गुज़र चुके शख़्स के बारे में मालूमात हासिल कर सकते हैं. और उसकी ज़िंदगी के बारे में भी पढ़ सकते हैं.
ये अच्छा है, बदलते दौर के साथ अंतिम संस्कार का तरीक़ा भी बदल रहा है. और मरने वालों को याद करने का पैटर्न भी