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Deadly Government Scheme : 70 साल के आजाद भारत की जान लेती सरकारी योजनाएं

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India Reduced Extreme Poverty
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Deadly Government Scheme : भारत नोटबंदी की पहली सालगिरह मनाने जा रहा है.

Deadly Government Scheme : झारखंड के सिमडेगा जिले में महज 11 साल की संतोषी 8 दिन तक खाना न मिलने के कारण भूख से तड़पते हुए मौत का शिकार हो गई.

न्यूज वेबसाइट स्क्रोल पर छपी खबर के मुताबिक संतोषी की मौत का कारण उसके सरकारी राशन कार्ड का आधार से लिंक ना होना बताया जा रहा है.
दरअसल इस साल के फरवरी माह से केंद्र सरकार ने राशन कार्ड को आधार से लिंक करवाना अनिवार्य कर दिया था.
लेकिन किसी कारण वश संतोषी के परिजन अपने राशन कार्ड को आधार से लिंक नहीं करा पाए , जिस वजह उन्हें राशन मिलना बंद हो गया था.
आपको बता दें कि संतोषी के पिता मानसिक तौर पर बीमार हैं जबकि उसकी मां और बहन दोनों मजदूरी कर के किसी तरह एक दिन का गुजारा करने भर कमा पाते हैं.
परिवार में आय का पर्याप्त साधन ना होने के कारण ऐसे में वो लोग राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के तहत मिलने वाले राशन पर निर्भर थे.
लेकिन सरकार के द्वारा बिना आधार के राशन पर लगने वाली रोक के चलते उनके परिवार में कई दिनों से किसी ने कुछ नहीं खाया था.
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जहां एक सरकारी योजना संतोषी और उसके परिवार का पेट भर रही थी तो दूसरा सरकारी फरमान उनके घर में मातम का कारण बन गया.
लेकिन ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ संतोषी के साथ ही हुआ हो बल्कि हमारे देश में कई ऐसे उदाहरण हैं जहाँ सरकारी योजनाएं लोगों की जान बचाने में नाकाम रही हैं.
कुपोषित होती योजनाएं
Deadly Government Scheme – हाल ही में जारी इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट के ताजा आंकड़ों के अनुसार वैश्विक भूख सूचकांक(ग्लोबल हंगर इंडेक्स) में 119 देशों की सूची में भारत का 100 वां स्थान है.
आपको यहां बताना जरूरी है कि तमाम योजनाओं और कार्यक्रमों के बाबजूद भी भारत में आज 21 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं.
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट की माने तो भारत में हर साल लगभग 10 लाख बच्चे 5 साल की उम्र पार करने से पहले ही कुपोषण के कारण मर जाते हैं.
हमारे देश में हर उम्र और वर्ग के लिए अलग-अलग योजनाएं तो हैं लेकिन फिलहाल सुविधाओं,आंगनबाड़ी केंद्रों और राजनीतिक इच्छाशक्ति के आभाव में वो खुद कुपोषित हो चुकी हैं.
योजनाएं नहीं बचा पा रही किसानों की जान
Deadly Government Scheme – अन्न की कमी से लोगों को मरता देख रहा ये देश एक समय में कृषि प्रधान और खेती करने वाला किसान अन्नदाता माना जाता था. वहीं अब की स्थिति पूरी तरह बदली हुई है. आज किसान खेती से जुड़ी समस्या और कर्ज इत्यादि से परेशान हो कर आत्महत्या का रास्ता अपना रहा है.
अगर हम राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो(एनसीआरबी) के आंकड़ों को देखें तो साल 2014 में 12,360 किसानों ने आत्महत्या की जो 2015 में 42 प्रतिशत तक बढ़ कर 12,602 हो गई.
हालांकि केन्द्र और राज्य सरकारों ने इन मौतों को रोकने हेतु दर्जनों योजनाएं लागू की रखी हैं. मगर योजनाओं को लागू करने में भारी गड़बडियां और अनियमितताओं के चलते वो अन्नदाताओं की आत्महत्या करने के सिलसिले को रोक पाने में असमर्थ साबित हो रही हैं.
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नोटबंदी के दौरान भी हुई मौतें
इस कड़ी में आगे बढ़ेंगे तो जिक्र नोटबंदी का भी आएगा क्योंकि अगले महीने देश 1000 और 500 के नोटबंदी की पहली सालगिरह मनाने जा रहा है.
इसी के साथ ही साथ तुगलकी फरमान में अपने नोट बदलवाते हुए प्राण खो देने वाले लगभग 100 लोगों के परिजन दिवंगत आत्माओं की बरसी मना रहे होंगे.
वहीं एक साल होने पर लोग इस सवाल के जवाब की भी प्रतिक्षा में लगे हुए होंगे कि हमारे आदरणीय प्रधानमंत्री ने जिस कारण नोटबंदी का अपना फरमान देश पर लागू किया था क्या उससे हमारे देश की आर्थिक और रक्षा स्थिति पर कुछ फर्क पड़ा.
हमारे मुल्क में हर योजना के काल्पनिक रूप में होने से लेकर क्रियान्वयन से गुजरने के दौरान और विफल होने के बाद भी अगर इसे कोई ढ़ोता रहता है तो वो है इस देश का आम आदमी.
जबकि हमारे गणमान्य को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता की उसकी योजनाओं की अनियमितताओं का शिकार कोई कुपोषण और भूख से मर रहा बच्चा हो रहा या दवाईयों के आभाव में जान देता बुजुर्ग.
अगर आजादी के 70 साल बाद भी आज भारत में  किसी की मौत भूख और बेहतर इलाज ना मिल पाने के कारण होती है. तो ऐसे में सरकार के द्वारा चलाई जा रही योजनाओं पर सवाल उठना तो बनता है.
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