Home विशेष रोहिंग्या मुस्लिमों से अलग नहीं है हमारे कश्मीरी पंडित भाईयों की पीड़ा

रोहिंग्या मुस्लिमों से अलग नहीं है हमारे कश्मीरी पंडित भाईयों की पीड़ा

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कश्मीरी पंडित
अपने हक की मांग करते हुए कश्मीरी पंडित
आज रोहिंग्या मुस्लिमों के साथ म्यंमार में जो कुछ भी हो रहा है, उसे कोई भी जिम्मेदार समाज कभी बर्दाश्त नहीं करेगा. यहां तक कि विश्व के तमाम मानवाधिकार संगठन से लेकर धर्म गुरूओं ने उनकी इस पीड़ा के दर्द को समझते हुए म्यंमार सरकार की काफी आलोचना भी की है.
हाल की खबरों के अनुसार पीछले कुछ घंटों में म्यांमार की तरफ से सैन्य कार्यवाही में लगभग 400 रोहिंग्या मुस्लिमों की मौत हो गई है. लगातार हो रहे हिंसा के डर से एक हफ्ते में 18 हजार रोहिंग्या मुस्लिम म्यांमार से भागकर बांगलादेश और भारत की सीमाओं में शरण लेने के लिए आ रहे हैं.
कश्मीरी पंडित
रोहिंग्या मुस्लिम महिलाएं
मगर क्या आपको पता है हमारे देश के अंदर भी कुछ इसी तरह का दंश आज से 27 साल पहले कश्मीरी पंडितो ने भी झेला है .
लेकिन क्या हम आज उनके इतिहास से वाकिफ हैं, वह अब कैसी हालत में हैं? ये जानने की कभी कोशिश की हमनें. ये वो सवाल हैं, जो हर भारतीय के जहन में होने चाहिए थे. मगर हम कर भी क्या सकते हैं हम लोगों को बचपन में यही सीखया गया है कि पुरानी बातों को लेकर आज मातम नहीं मनाना चाहिए.
हां यह तब होता जब हम उन्हें अपना समझते. लेकिन हमने तो उन्हें कभी नेताओं के भाषणों में इस्तेमाल किए गए शब्द से ज्यादा कुछ समझा ही नहीं
कौन हैं कश्मीरी पंडित

कश्मीर में रहने वाले पंडितों को कश्मीरी पंडित कहा जाता था. सभी कश्मीरी पंडित मूल रूप से हिंदू थे. आजादी से पहले तक कश्मीर में लगभग 90 फीसदी आबादी कश्मीरी पंडितों की ही थी.

इनकी संस्कृति को करीब 3 हजार वर्ष पुरानी माना गया है. जो यह दर्शाता है कि कश्मीर में शुरू से ही हिंदू कश्मीरी पंडितों का अधिकार था.
लेकिन 27 साल पहले कश्मीर की शांत घाटियों में आए हिंसक सैलाब ने इन्हें दमनपूर्वक घर से बाहर निकाल दिया , और उनके घर में जबरन घुसे मुस्लिम अलगाववादियों ने अपना डेरा जमा लिया
कश्मीरी पंडित
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यहां से शुरू हुआ अत्याचार

14वीं शताब्दी में तुर्किस्तान का खूंखार मुस्लिम आतंकी दुलुचा ने 55 हजार सैनिकों के साथ कश्मीर में आक्रमण  कर दिया. जिसमें उसने कश्मीर में करीब 30 हजार से अधिक हिंदूओं को मौत के घाट उतार दिया और जो बचे थे उनका जबरन धर्मांन्तरण कराने लगा.

जबकि हजारों की संख्या में धर्मांतऱण न करने वाले कश्मीरी पंडितों ने किसी तरह   पाकिस्तान( तब भारत का हिस्सा था) में भागकर अपनी जान बचाई. तब से अभी तक का समय है, उनकी घर वापसी नहीं हो पाई.
सबसे बड़ा अत्याचार हमारे कश्मीरी पंडित भाईयों ने झेला
कुछ ताकतें शुरू से ही कश्मीर को मुस्लिम बहुल क्षेत्र बनाने की साजिश में लगी हुई थी.
सितंबर 1989 में कश्मीरी पंडितों की लड़ाई लड़ रहे बीजेपी नेता तिलक लाल तप्लू का जेकेएलएफ ने कत्ल कर दिया. उसके बाद जस्टिस नील कांत गंजू को गोली मार दी गई. इसके अलावा निर्दोष 350 से अधिक हिंदू महिलाओं और पुरूषों को मौत के घाट उतार दिया गया.
इतना ही नहीं, कश्मीरी पंडितों में भय पैदा करने के लिए श्रीनगर स्थित अस्पताल में नर्सों के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया.
यह सब खूनी खेल कई दिनों तक चलता रहा लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि उस समय शासन में रही सरकार कश्मीरी पंडितों के साथ हो रहे अत्याचारों पर खामोश बैठी रही.
इन सब के बाद एक दिन 19 जनवरी 1990 में एक स्थानीय उर्दू अखबार ने हिज्बुल मुजाहिदीन की तरफ से एक प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुए कहा कि सभी हिंदू अपना सामान पैक करें और कश्मीर छोड़कर चले जाएं.
उसके बाद एक अन्य समाचार पत्र में भी हिंदूओं को मुस्लिम ड्रेस कोड अपनाने को कहा गया. फिर कहा गया कि मुस्लिम धर्म अपनाओ, नहीं तो तुम्हें कश्मीर से निकाल दिया जाएगा.
यह खबर आग की तरह घाटी में फैल गई जगह जगह कश्मीरी पंडितों को लोगों ने मारना शुरू कर दिया. महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार की शर्मनाक घटनाएं होने लगी.
रोज बढ़ती हिंसा की घटनाओं से मजबूर होकर 4 लाख कश्मीरी पंड़ित अपने घर छोड़ने पर मजबूर गो गए और दिल्ली और आजपास के इलाकों में पलायन कर रहने लगे
किस हाल में हैं कश्मीरी पंडित
वर्तमान में करीब साढ़े 4 लाख कश्मीरी पंडित अपने ही देश में शरणार्थी की तरह जीवन यापन करने को मजबूर हैं.
कश्मीरी पंडित
फोटो साभार- द वायर
उन्हें देखने वाला कोई नहीं है, न तो उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ मिलता है, और ना ही कोई सामाजिक संस्था उनकी सहायता को आगे आती हैं.
दुर्भाग्य की बात तो यह है कि आम आदमी को न्याय दिलाने की बात करने वाले मीडिया का कैमरा भी कश्मीरी पंडितो की तरफ तभी घुमता है जब उन्हें इसमें कोई मिर्च मसाला दिखता है
आज कश्मीरी पंडित खुले में लगे टैंटों में अपनी रातें गुजार रहे है. लेकिन किसी सरकार में इतनी इच्छाशक्ति नहीं है कि कश्मीरी पंडितों को उनके पूर्वजों की भूमि में लौटने का आदेश दे सके
यह हमारे लिए किसी शर्म से कम नहीं कि हमारी आंखों के सामने ही हमारे भाई जमीन पर जीवन बीता रहे हैं. और बाहरी लोग (मुस्लिम अलगाववादी) हमारे भाईयों के संसाधनों पर कब्जा कर उसका इस्तेमाल हमारी सेना के खिलाफ ही कर रहे हैं.
मगर हमें क्या हम कल भी तमाशबीन थे और आज भी तमाशबीन ही हैं