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Kids Right Foundation : जानें, उन 10 भारतीय बच्चों की कहानी जिन्हें इंटरनेशनल चिल्ड्रेन्स पीस पुरस्कार के लिए नॉमिनेट किया गया है

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Kids Right Foundation : दुनिया भर से 169 बच्चे हुए नॉमिनेट

Kids Right Foundation : किड्‌स राइट्‌स फाउंडेशन की तरफ से 4 दिसम्बर, 2017 को  पुरस्कार 2017 प्रदान करने की घोषणा की गई है.

वास्तव में, यह पुरस्कार हर साल दुनिया भर के ऐसे बच्चों को दिया जाता है जिसने बाल अधिकारों के लिए साहसपूर्वक संघर्ष किया हो.
इस पुरस्कार की स्थापना 2005 में  किड्‌स राइट्‌स (Kids Rights) द्वारा की गई है जो बच्चों के साथ मिलकर ऐसे विश्व की रचना के लिए प्रयासरत है जहां उनके अधिकारों की गारंटी हो.
आईए जानते हैं भारत की तरफ से उन 10 बच्चों के बारे में जिन्हें इस पुरस्कार के लिए नॉमिनेट किया गया है.
शैलेंद्र सिंह : उम्र – 17 साल
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शैलेंद्र सिंह को अपने गांव में बाल विवाह रोकने और बच्चों की शिक्षा के क्षेत्र में किए गए उनके कामों के लिए नॉमिनेट किया गया है.
आपको यह जानकर हैरानी होगी कि शैलेंद्र ने अपने गांव में होने वाली पांच नाबालिगों की शादियां रुकवाई है.
और उससे भी मजेदार यह है कि उन्होंने यह काम किसी जबरदस्ती नहीं किया बल्कि उन बच्चों के माता पिता को समझाया कि यह गलत है और आने वाले समय में इससे क्या क्या परेशानियां हो सकती है.
सिर्फ यही नहीं वह लगातार बाल मजदूरी के खिलाफ भी काम रहे हैं. अब तक शैलेंद्र 33 बच्चों को बाल मजदूरी से निकलवाकर उनकी शिक्षा का भी ख्याल रख रहे हैं.
निखिया शमशेर : उम्र – 15 साल
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डॉक्टर की लड़की होने के नाते निखिया ने कभी गरीबी नहीं देखी. मगर जब उनके घर में काम करने वाली अनकी बाई की बच्ची को एक स्कूल बैग की जरूरत थी तो ऐसे में निखिया ने उसे बैग दिलाया जिसके लिए उस बच्ची ने उन्हें एक थेंक्यू नोट दिया.
इस थेंक्यू नोट ने ही निखिया को एहसास दिलाया कि ऐसे कितने सारे लोग हैं जिनके पास बैग, किताबें जैसी मामूली जरूरत के लिए भी पैसे नहीं है.
इसके बाद उन्होंने बैग्स, बुक्स और ब्लेसिंग्स नाम से एक प्रोजेक्ट शुरू किया जिसमें वो लोगों से बैग और बाकि की पढ़ाई से जुड़ी चीजों को डोनेशन में लेकर जरूरतमंद तक पहुंचाती हैं.
यहीं नहीं इसके बाद उन्होंने यर्न को लर्न के नाम से एक और प्रोजेक्ट की शुरूआत कि है जिसके तहत वह अब तक 9 स्कूलों में 35 केमेस्ट्री, बॉयलोजी और मैथ्स लैब भी खुलवा चुकी हैं, जिससे लगभग 6000 बच्चे शिक्षा हासिल कर रहे हैं.
शक्ति रमेश : उम्र – 12 साल
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बचपन से ही गरीबी में जीवन बिता रहे शक्ति जीवन-काल की हर मुश्किल से अच्छे से परिचित हैं.
स्कूल में दूसरे बच्चों के द्वारा परेशान करने के बाद उन्होंने स्कूल छोड़कर काम करना शुरू कर दिया.
कुछ समय बाद उन्हें हैंड इन हैंड स्कूल के बारे में पता चला जहां बच्चों को खास कामों के लिए ट्रेनिंग दी जाती है. बच्चे वहीं रहकर काम सीखते हैं जिससे वह आगे के अपने जीवन के स्तर में सुधार ला सके.
शक्ति अब बाकि बच्चों को भी इसमें दखिला लेने के लिए प्रेरित करते हैं. वह अब तक 25 बच्चों का अपने प्रयासों से इस स्कूल में दखिला करवा चुके हैं.
सुमित्रा नायक: उम्र – 17 साल
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गरीबी में पैदा हुई सुमित्रा के लिए दो वक्त की रोटी भी जुटाना मुश्किल था. उसके पिता शराब के आदी थे, जो प्रायः घर देर से आते और उसकी मां के साथ मानसिक और शारीरिक दुर्व्यवहार करते थे.
जब उनकी मां के लिए यह सब असहनीय हो गया तो वे सुमित्रा और उनकी तीन बहनों को लेकर भुवनेश्वर चली गईं.
वहां जाने के बाद वो लोग किसी तरह दो वक्त का खाना जुटाकर गुजर-बसर करने लगे.
फिर कुछ समय बाद 2008 में सुमित्रा की गराबी को देखते हुए उनका चयन कलिंग कॉलेज ऑफ सामाजिक विज्ञान में हो गया.
वहां वो अपने मित्रों की देखा-देखी रग्बी खेल की ओर आकर्षित हो गई, और जल्दी ही उसने इस खेल को अपना लिया.
इसके बाद 2012 में सुमित्रा ने अपना पहला राज्य स्तरीय मैच खेला.
दो साल बाद उसने U-13 महिलाओं के रग्बी वर्ल्ड कप और इसके बाद नेशनल चैम्पियनशिप में और फिर नेशनल स्कूल गेम्स में भाग लिया.
पिछले साल दुबई में आयोजित एशियन गर्ल्स रग्बी सेवेन्स (U-18) में उन्होंने अपनी टीम को कांस्य पदक जीताने में अहम भूमिका निभाई.
आनंद कृष्ण : उम्र – 13 साल
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आनंद ने 2012 में बाल चौपाल के नाम से एक संस्था की शुरूआत की थी. इस संस्था का लक्ष्य ऐसे बच्चों को शिक्षा देना है जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं.
पिछले पांच साल में बाल चौपाल संस्था करीब 750 बच्चों को शिक्षा दे चुकी है.
अतिशा मारवें : उम्र – 17 साल
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घर में नशे के आदी पिता और घरेलू हिंसा की वजह से एतिशा पढ़ाई लिखाई में बहुत कमजोर हो गईं थी.
मगर शिक्षा के प्रति उनकी ललक ने उसे अपने हक के लिए आवाज उठाने को मजबूर कर दिया जिसके बाद एतिशा ने अपने बुनियादी हक पाने के लिए संघर्ष किया और विजय पाने में भी सफल हुईं.
अतिशा का मानना है कि बच्चों के बुनियादी अधिकारों की सुरक्षा का रास्ता शिक्षा से होकर ही गुजरता है.
निधी कुमार : उम्र – 15 साल
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आर्थिक हालात सही न होने के चलते निधी के माँ-बाप उसे पालने का सामर्थ न उठा सके और निधी बिहार में अपने दादा-दादी के साथ रहने लगी.
वहां के लोगों ने उसके स्कूल जाने का विरोध किया लेकिन निधी के दादा विरोध के आगे झुके नहीं और निधी को स्कूल भेजते रहे.
आज निधी बदलाव का जीता जागता उदाहरण बन गईं हैं. अब निधी आस-पास के स्कूलों और कॉलेजों में जा कर छात्रों को शिक्षा के उनके हक और उसके फायदे से अवगत कराती हैं.
निधी अब अपने स्कूल के छात्रों के अधिकारों के लिए बने छात्र समूह की प्रमुख सदस्य भी हैं.
सलेहा बानो : उम्र – 17 साल
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शिक्षा के अधिकार और बच्चों को बेहतर स्वास्थ सुविधा उपलब्ध कराने की मुहीम में लगी सलेहा अपने समाज में लगभग 200 लड़कियों को प्रोत्साहित कर चुकीं हैं.
जिनमें से 10 ने तो फिर से स्कूल जाना शुरू भी कर दिया है. पिछले दो सालों में लड़कियों के मासिक धर्म और स्वच्छता संबंधित अन्य मुद्दों पर 250 से अधिक सत्रों के माध्यम से सलेहा ने लगभग 1500 किशोरों से इस मुद्दे के बारे में बात की है.
किरण गारवा : उम्र – 14 साल
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किरण के पिता नहीं है, जब तक थे तब तक वह स्कूल जाया करती थी. लेकिन पिता की मौत के बाद वह स्कूल नहीं जा पाई और उनकी मां ने उन्हें उनकी दादी के पास रहने के लिए भेज दिया.
लोगों के लाख माना करने के बाद भी किरण के दादा ने उसे स्कूल भेजना जारी रखा.
यहीं पर वह एसओएस समुह से जुड़ीं जो बच्चों के शिक्षा के अधिकार के लिए लड़ती है.
किरण अब इसी समुह का हिस्सा है औऱ वह स्कूलों कॉलेजों में जाकर वार्कशॉप लेती है और लोगों को शिक्षा का महत्तव समझती है.
 पूनम : उम्र – 16 साल
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आगरा की झुग्गीयों में रहने वाली पूनम आज वहां के लोगों के लिए प्रेरणा बन गई हैं.
पांच साल की उम्र से बाल मजदूरी करने वाली पूनम को कभी वह जीवन रास नहीं आया वह हमेशा से उस बंधन को तोड़ आजाद होना चाहती थी.
आज पूनम फेडरेशन ऑफ स्ट्रीट एंड वर्किंग चाइल्ड इन नार्थ इंडिया की जिला सेक्रेटरी हैं.
वह चाइल्ड लेबर, चाइल्ड एब्यूज, चाइल्ड मैरिज राइट को लेकर जागरुकता फैलाती हैं.

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