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जानिए क्या है ये पेरिस समझौता, और क्यों ट्रंप लगा रहे भारत और चीन पर इसमें गड़बड़ी के आरोप

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America Withdrawl Iran Nucleur Deal

Paris Climate Deal : 195 देश हैं इस समझौते का हिस्सा

Paris Climate Deal : पेरिस समझौते पर चल रही देशों की सियासत और गर्माती जा रही है. हाल ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जलवायु परिवर्तन के समझौते पर बोलते हुए एक बार फिर भारत और चीन को जिम्मेदार ठहराया है.

भारत और चीन पर आरोप लगाते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका के पेरिस समझौते से बाहर होने का सबसे बड़ा कारण भारत और चीन ही है.
वहीं अमेरीकी राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि ग्लोबल वार्मिंग को लेकर हुया यह समझौता शुरूआत से ही ठीक नहीं था. क्योंकि इससे सिर्फ दो देशों को ही सबसे ज्यादा फायदा मिल रहा था.
आपको बता दें कि राष्ट्रपति ट्रंप ने पहले भी जून 2017 में पेरिस समझौते से पीछे हटने की बात कही थी. उस समय ट्रंप ने कहा था कि अगर यह समझौता होता है तो अमेरिका को खरबों डॉलर का नुकसान झेलना पड़ सकता है, साथ ही देश में नौकरियों में कमी आएगी और तेल, गैस, कोयला एवं निर्माण उद्योगों पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा.
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क्या है पेरिस समझौता
पेरिस समझौता मुख्य रूप से वैश्विक तापमान में बढ़ोत्तरी को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने को लेकर बनाया गया है. इस समझौते से जुड़े सभी देश वैश्विक तापमान में हो रही बढ़ोत्तरी को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक रखने की कोशिश और विचार विमर्श करते है.
दरअसल वातावरण पर लगातार की जा रही शोधों को देखते हुए वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अगर 2 डिग्री से ऊपर तापमान में बढ़ोतरी होती है, तो इससे धरती की जलवायु में बहुत बड़ा बदलाव हो सकता है.
जिसके प्रभाव से समुद्र तल में ऊफान, बाढ़, ज़मीन धंसना, सूखा, दावानल जैसी भयानक आपदाओं का सामना करना पड़ सकता है. हालांकि पहले ही औद्योगिकीकरण के चलते धरती का तापमान एक डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है.
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कितने देश हैं शामिल
जलवायु परिवर्तन को लेकर किए जाने वाले प्रयासों के लिए बनाए गए पेरिस समझौते को 2015 में 195 देशों के बीच सहमति से स्वीकार किया गया था, जिसमें भारत, अमेरिका और चीन भी शामिल हैं.
पेरिस समझौते के मुताबिक़ दुनिया के क़रीब 55 फ़ीसदी कार्बन उत्सर्जन करने वाले देशों को इसे मानना है.
भारत से पहले 61 देशों ने इस समझौते को अपनी मंजूरी दी थी, जो तकरीबन 48 फ़ीसदी कार्बन उत्सर्जित करते हैं. जिसके लगभग एक साल बाद भारत ने भी इसे अपनी मंज़ूरी दे दी है.
बहरहाल, ट्रंप के लगाए आरोपों पर भारत और चीन ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, वहीं अभी तक अमेरिका की तरफ से भी इस समझौते से बाहर होने की लिखित पुष्टि नहीं की गई है.
ऐसे में आरोप-प्रत्यारोपों का गर्माता माहौल किसके लिए फायदेमंद साबित होगा और किस पर इसका गलत प्रभाव पड़ेगा यह कह पाना अभी मुश्किल है.