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आखिर क्यूं हो रहें राम के नाम पर दंगे, कौन है इसका जिम्मेदार नेता या हमारी आस्था ?

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Ramnavmi Communal Riots
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Ramnavmi Communal Riots : बंगाल के आसनसोल से उठी दंगे की आग

Ramnavmi Communal Riots : संविधान के अनुसार हमारा देश एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है लेकिन राजनेताओं की नजर से यह कभी हिन्दु तो कभी मुसलमान बाहुल्य हो जाता है.

आम जनता जिन्हें अपने दैनिक जीवन चर्या से बड़ी मुश्किल से कुछ और सोचने की फुरसत मिलती है, लेकिन धर्म के नाम पर वो भी अपना कान (ध्यान) देऩे से पीछे नहीं हटते.
इसका ताजा उदाहरण बिहार और बंगाल में रामनवमी के बाद से हो रहे सांप्रदायिक दंगों में देखने को मिला है.
बंगाल के आसनसोल से उठी दंगे की आग
बंगाल और बिहार में सांप्रदायिक दंगे की शुरूआत रामनवमी में निकाले जाने वाले जूलुस के बाद से शुरू हुई. इस दंगे की हवा पश्चिम बंगाल के आसनसोल से शुरू हो कर बिहार के औरंगाबाद से होते हुए अब नवादा जिले तक पहुंच चुकी है.
बता दें कि पश्चिम बंगाल के आसनसोल और पश्चिम वर्द्धमान जिले के रानीगंज इलाके में रविवार और सोमवार को राम नवमी जुलूस के दौरान दो समूहों में हिंसक झड़प हो गई थी, जिसके बाद से पूरे जिले भर में दंगे भड़क उठे.
मीडिया रिपोर्टस के अनुसार इस हिंसा में अब तक एक व्यक्ति की मौत हुई है और दो पुलिस अधिकारी जख्मी हुए हैं.
गौरतलब है कि दंगे को रोकने के लिए वहां पुलिस को धारा 144 तक का इस्तेमाल करना पड़ा और इसके साथ ही जिले में इंटरनेट सेवाओं पर भी कुछ समय के लिए रोक लगानी पड़ी.
हिंसा के बाद अभी कई महिलाओं ने रिलीफ़ कैंप में शरण ले रखी है. वहीं शनिवार को राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी ने मौजूदा स्थितियों का जायजा लेने के लिए खुद दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा किया है.
ताजा अपडेट्स के मुताबिक बंगाल में अभी स्थिति नियंत्रण में है लेकिन अब इन सांप्रदाय़िक दंगों की आग देश के अन्य राज्यों में भी फैलनी शुरू हो गई हैं जिसमें प्रधानमंत्री का गृहराज्य गुजरात भी शामिल हो गया है.
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बिहार में सांप्रदाय़िक दंगों की क्या है वजह
बिहार में भागलपुर दंगे की आग अभी ठीक से बुझी ही नहीं थी कि रामनवमी के बाद ये धीरे-धीरे अपने पैर पसारते हुए औरंगाबाद, समस्तीपुर, मुंगेर, नवादा होते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गृह ज़िले नालंदा तक पहुँच गई है.
यूं तो बिहार में नीतीश कुमार को काफी कड़क और अच्छा राजनेता माना जाता है, वहां का इतिहास रहा है कि अपने शासन काल में कभी नीतीश ने सांप्रदायिक दंगों को बिहार में पनपने नहीं दिया.
मगर अच्छे राजनेता होने के बाद अचानक 2018 में ऐसा क्या हो गया कि नीतीश कुमार के राज्य में इस कदर सांप्रदायिक सौहार्द बिगाडने वाली घटनाओं में इजाफा होने लगा.
आखिर उनकी इस नाकामयाबी के पीछे क्या कारण है? इन सभी प्रश्नों पर फिलहाल संशय अभी बरकरार है.

क्या साजिश के तहत हो रहे हैं ये दंगे?

बिहार में ये पहली बार हुआ है कि रामनवमी पर इतनी बड़ी संख्या में शोभा यात्राएं निकाली गई हैं सिर्फ़ रामनवमी के दिन ही नहीं, उसके अगले तीन दिनों तक कई ज़िलों में जुलूस का आयोजन किया गया.
नीतीश कुमार के गृह ज़िले नालंदा के निवासी और शिक्षक विकास मेघल ने बीबीसी से अपनी बातचीत में कहा कि जहाँ तक उन्हें याद है, पिछले दो सालों से बिहार में शोभा यात्राएँ भव्य तरीके से निकाली जा रही हैं. लेकिन उनका स्तर इतना बड़ा नहीं होता था उन्होंने बताया कि इस तरह की भव्यता का इतिहास नालंदा में कभी नहीं रहा.
इस घटना से यह साफ अंदाजा लगाया जा सकता है कि नीतीश कुमार पर भाजपा हावी हो रही है. जिस नालंदा ज़िले में उनका सिक्का चलता था, वहाँ भी सांप्रदायिक दंगे की घटना होना प्रशासन पर सीएम की कमजोर पकड़ के साफ संकेत हैं.
वहीं अगर पश्चिम बंगाल की बात करे तो वहां भी बीते पांच सालों में सांप्रदायिक तनाव में लगातार बढ़ोतरी हुई है.
सूबे की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एक तरफ जहां अल्पसंख्यकों को अपनी तरफ करने के लिए आए दिन कोई ना कोई नए प्रयास करती रहती हैं. वहीं केंद्र में बैठी बीजेपी के नेता अपने हिंदू वोट बैंक को उनके खिलाफ करने की पूरी कोशिश में लगे रहते हैं.
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राम के नाम पर क्यूं लोग हो जाते हैं भावुक
हिंदु धर्म को काफी सरल माना जाता है इसके बावजुद इसमें भी पिछले कुछ सालों में कट्टरता देखने को मिलने लगी है, सभी जानते हैं कि ईश्वर अपनी जगह है और धर्म अपनी.
इसके बावजुद चंद राजनेताओं के भड़काउ भाषणों की बदौलत लोग भावुक हो जाते हैं जिनमें सबसे ज्यादा युवाओं की संख्या होती है.
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ये युवा बेरोजगार हैं चंद पैसों और नौकरी ना मिलने की हताशा में आकर ये लोग दूसरे के भड़काए दंगों में शामिल हो जाते हैं और बाद में खुद इसका शिकार भी हो जाते हैं.
लोकसभा चुनाव का समय है इसलिए हमारे माननीय नेतागण  देश के अहम मुद्दे से जनता का ध्यान हटाना चाहतें है और यह सांप्रदायिक दंगा इसी के लिए उठाया गया एक कदम है.
यहां हम सभी को यह सोचना चाहिए की ये दंगे वास्तव में किस बुनियाद पर टिके हुए हो सकते हैं, उन राजनेताओं की कुर्सी की चाह पर या हमारी मनगंढ़त आस्था पर.
आने वाले दिनों में जब यह दंगे पूरे तरह खत्म हो जाएंगे और लोग अपने अपने काम में व्यस्त हो जाएंगे तो बिहार और बंगाल की जनता खुद ब खुद समझ जाएगी कि उनके यहां होने वाले सांप्रदायिक दंगों का जिम्मेदार कौन था वे चंद गद्दी पर बैठे राजनेता या हम बेवकुफ जनता.

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