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Sonia Gandhi : विदेशी मूल की होने के बावजूद, देश की राजनीति में मिसाल हैं ‘मैडम सोनिया’

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SONIA GANDHI
फोटो साभार - नेटवर्क18

Sonia Gandhi : जानिए अल्बिना मेनो से सोनिया गांधी तक का सफर

Sonia Gandhi : सोनिया गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से सन्यास की घोषणा क्या की, पूरे कांग्रेससियों के चेहरे भावुक हो गए.

वहीं अगर इसके पीछे के असल मायने समझने की कोशिश करें तो यह स्वाभाविक भी है. क्योंकि विदेशी मूल की महिला होने के बाद भी श्रीमती गांधी ने भारतीय संस्कृति और राजनीति दोनों ही क्षेत्र में मिसाल कायम करने का काम किया है.
जब राजीव गांधी से मिली थी सायना मायनो
इटली के लुसियाना शहर में जन्मी एंटोनिया एडविगे अल्बिना मेनो आज की सोनिया गांधी की राजीव गांधी से पहली मुलाकात 1966 में एक रेस्टोरेंट में हुई थी. उस दौरान राजीव गांधी कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे.
राजीव पहली ही मुलाकात में सोनिया को पसंद करने लगे थे. और इसके बाद जब इन दोनो का प्रेम परवान चढ़ा तो 1968 में अल्बिना मेनो(सोनिया गांधी) और राजीव गांधी ने विवाह करने का फैसला किया.
शादी के बाद राजीव और सोनिया दोनों भारत आकर रहने लगे. भारत आने पर अल्बिना मेनो का नाम भारतीय परंपराओं के लिहाज से सोनिया रखा गया.
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1984 में इंदिरा गांधी की मौत के बाद जब कांग्रेस पार्टी की पूरी जिम्मेदारी राजीव गांधी के कंधों पर आ गई. तब सोनिया गांधी ने अपने पतिव्रता फर्ज को निभाते हुए राजीव के राजनीतिक सफर की शुरूआत करने में अहम भूमिका निभाई थी.

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पति की मौत के बाद सोनिया ने किया राजनीति से किनारा
1991 में राजीव गांधी की आत्मघाती हमले में मौत के बाद कांग्रेस पार्टी को नेतृत्व की जरूरत थी .ऐसे में कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने सोनिया गांधी से पार्टी का नेतृत्व करने का अनुरोध किया, तो सोनिया गांधी का जवाब सुनने लायक था.
उस समय सोनिया ने कहा था कि मैं अपने बच्चों को भीख मांगते देखना पसंद करूंगी, लेकिन कांग्रेस की कमान नहीं संभालूंगी.
इसका मतलब यह था कि मैं अपने परिवार का भविष्य जरूर डूबता देखना पसंद करूंगी, मगर जब मुझमें देश का नेतृत्व करने की क्षमता विकसित नहीं हुई है, तो फिर मैं देश के भविष्य के साथ समझौता कैसे कर सकती हूं.
जिसके बाद सोनिया ने 1998 में जाकर कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष बनने के लिए अपनी इच्छा जताई.

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2004 में ठुकराया था प्रधानमंत्री पद
2004 के आम चुनाव में कांग्रेस पार्टी को हराने के लिए भाजपा समेत कई विपक्षी दलों ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा खूब उठाया था. मगर इस मुद्दे का असर कुछ खास नहीं दिखाई दिया.
जनता ने कांग्रेस पार्टी पर विश्वास जताते हुए उसे 200 से अधिक सीटें दी जिसके बाद कांग्रेस पार्टी ने अन्य सहयोगी दलों के साथ मिलकर यूपीए की सरकार बनाई.
सरकार बनने पर सभी दलों ने सर्वसम्मति से सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री पद के लिए चुना, लेकिन श्रीमती गांधी ने राजनीतिक महत्वाकांक्षा को किनारे करते हुए फैसला मानने से इंकार कर दिया.
उन्होंने कहा कि वह कांग्रेस पार्टी को मजबूत करने के लिए ही काम करना चाहती हैं. उन्हें प्रधानमंत्री पद का लालच नहीं है. सोनिया गांधी के इसी फैसले पर पूरी पार्टी के साथ ही विपक्षी दल भी उनके कायल हो गए थे.
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सुषमा स्वराज और उमा भारती ने उठाया था विदेशी मूल का मुद्दा
गौरतलब है कि जब सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने की चर्चाएं जोरो पर थी, तब भाजपा की शीर्ष नेता सुषमा स्वराज और उमा भारती ने चेतावनी दी थी कि अगर विदेशी मूल की महिला देश की प्रधानमंत्री बनती है तो वह अपना सिर मुंडवा लेंगी.
राजनीतिक जानकारों का यह भी कहना है कि सोनिया गांधी ने सुषमा स्वराज औऱ उमा भारती के विरोध के कारण भी प्रधानमत्री बनने से इंकार किया था, क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि देश में कोई राजनीतिक असंतोष पनपे.

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इंदिरा गांधी से सीखी राजनीतिक और सांस्कृतिक परंपरा
मीडिया को दिए इंटरव्यूह में सोनिया गांधी ने कई बार यह बताया है कि उन्हें भारत की संस्कृति के बारे पूर्व प्रधानमंत्री एवं उनकी सास इंदिरा गांधी अच्छे से समझाती थी.
सोनिया ने कहा कि पहले उन्हें भारतीय संस्कृति के बारे में बिल्कुल भी नहीं पता था, लेकिन समय के साथ-साथ इंदिरा गांधी नें उन्हें सबकुछ सिखा दिया.
 इन सब पहलुओं पर गौर करें तो सोनिया गांधी ने भारतीय राजनीति में नए आयाम जरूर स्थापित किए हैं, वरना राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को दरकिनार करते हुए भारत जैसे बड़े देश का प्रधानमंत्री का पद कौन ठुकराता.
अपनी सास और पति को खोने के बाद भी पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने जिस तरह अपने संगठन को मजबूत बनाने का प्रयास किया वो वाकई उनकी उस जिम्मेदारी को दिखाता है जो कि नेहरू गांधी परिवार की बहु को निभाने का फर्ज था.
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