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Swami Vivekanand Jayanti : युवाकाल में पिता के विरुद्ध लिया गया विवेकानंद जी का ये फैसला, आज है नौजवानों की प्रेरणा

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Swami Vivekanand Jayanti

Swami Vivekanand Jayanti : देश आज विवेकानंद की 155वीं जयंति मना रहा है

Swami Vivekanand Jayanti : आज हमारे देश के एक ऐसे संत का जन्मदिन है जिन्होंने हमारे भारत को सर्वप्रथम विश्व गुरू के रूप में अंतराष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाई थी.

इस अस्मरणीय संत का नाम है स्वामी विवेकानंद, जो हमारे देश के वो अनमोल रत्न थे जिनकी चमक आज भी देशवासियों को अंधेरे से उजाले की और ले जाती है.
विवेकानंद ने ना सिर्फ सिर्फ देश में बल्कि विदेशों में भी भारत का नाम रोशन किया है. सितंबर 1893 को शिकागो (अमेरिका) में हुए विश्व धर्म सम्मेलन में उन्होंने भारत की संस्कृति और परंपरा की जिस तरह व्याख्या की वो आज भी लोगों के जेहन में उतना ही ताजा है.
पिता की इच्छा के विरूद्ध लिया फैसला
12 जनवरी, 1863 को कलकत्ता (अब कोलकाता) के एक कायस्थ परिवार के विश्वनाथ दत्त के घर में जन्मे नरेंद्रनाथ दत्त (स्वामी विवेकानंद) को हिंदू धर्म के मुख्य प्रचारक के रूप में जाना जाता है.
विवेकानंद के विपरीत नरेंद्र के पिता पाश्चात्य सभ्यता में विश्वास रखते थे. वह चाहते थे कि उनका पुत्र भी पाश्चात्य सभ्यता के मार्ग पर चले.
मगर नरेंद्र ने उनकी इस इच्छा के विरूद्ध 25 साल की उम्र में ही घर-परिवार छोड़कर संन्यासी का जीवन अपना लिया. जिसके बाद परमात्मा को पाने की लालसा के साथ तेज दिमाग ने युवक नरेंद्र को देश के साथ-साथ दुनिया में विख्यात बना दिया.
नरेंद्रनाथ दत्त की जिंदगी में सबसे बड़ा मोड़ 1881 के अंत और 1882 के प्रारंभ में आया, जब वह अपने दो मित्रों के साथ धर्म को जानने के लिए दक्षिणेश्वर के काली-भक्त रामकृष्ण परमहंस से मिले. और यहीं से नरेंद्र का ‘स्वामी विवेकानंद’ बनने के सफर की शुरूआत हुई.
रामकृष्ण परमहंस से मिलने के बाद स्वामी विवेकानंद का झुकाव आध्यात्म को जानने में और अधिक हो गया और इसी कराण उन्होंने युवा अवस्था में ही भगवा पोशाक धारण कर लिया और धर्म को जानने के लिए देश विदेश के भ्रमण पर निकल गए .
हालांकि विवेकानंद जी और रामकृष्ण जी का साथ ज्यादा नहीं रहा मगर इतने कम समय में ही उन्होंने स्वामी विवेकानंद को ज्ञान के कई पाठ पढ़ा दिए.
रामकृष्ण के जीवन का एक ही मूल मंत्र था और इसे वो अपने सभी शिष्यों को भी बताते थे कि “मनुष्य की सेवा करना ही भगवान की सबसे बड़ी पूजा है”.
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इस तारीख को मनाते हैं युवा दिवस 
करोड़ो युवाओं के प्रेरणा रहे स्वामी विवेकानंद के हर जन्मदिवस को साल 1985 से भारत सरकार राष्ट्रीय युवा दिवस के रुप में मनाती है.
इस दिन को मनाने का उद्देश्य युवा पीढ़ी को उनके पवित्र आदर्शों के प्रति प्रेरित करना रहता है साथ ही इस दिन सभी वर्ग के लोग स्वामी विवेकानंद और देश के लिए उनके द्वारा किए गए योगदान को याद करते हैं.
बता दें कि हर साल की 12 जनवरी को रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन की सभी शाखाओं के मुख्यालयों पर यह दिन महान श्रद्धा के साथ मनाया जाता है.
30 वर्ष की आयु में स्वामी विवेकानंद ने शिकागो, अमेरिका में विश्व धर्म सम्मेलन में हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व किया और उसे सार्वभौमिक पहचान दिलवाई थी. जिसके बारे में
गंगा नदी नहीं हमारी मां है
एक बार अमेरिका में कुछ पत्रकारों ने स्वामीजी से भारत की नदियों के बारे में प्रश्न पूछा कि आपके देश में किस नदी का जल सबसे अच्छा है? इस पर स्वामीजी का उत्तर था- यमुना.
तभी पत्रकार ने कहा आपके देशवासी तो बोलते हैं कि गंगा का जल सबसे अच्छा है. फिर स्वामी जी ने कहा कि कौन कहता है गंगा नदी हैं, वो तो हमारी मां हैं. यह सुनकर सभी लोग स्तब्ध रह गए.
स्वामी विवेकानंद की कम उम्र में मृत्यु को लेकर मशहूर बांग्ला लेखक शंकर ने अपनी किताब ‘द मॉन्क ऐज मैन‘ में लिखा था कि स्वामी अनिद्रा, मलेरिया, माइग्रेन, डायबिटीज समेत दिल, किडनी और लिवर से जुड़ी 31 बीमारियों के शिकार थे. इसी वजह से उनका सिर्फ 39 साल की उम्र में 4 जुलाई, 1902 को निधन हो गया.
हालांकि स्वामी विवेकानंद के शिष्य आज भी यह मानते हैं की स्वामी जी ने अपनी मर्ज़ी से समाधि ली है और शरीर का त्याग किया. परंतु वैज्ञानिक आधारों को मानने वाले लोग इस समाधि की संकल्पना पर बिलकुल भी यक़ीन नहीं करते और इसे ख़ारिज करते हैं.
39 वर्ष के संक्षिप्त जीवनकाल में स्वामी विवेकानंद जो काम कर गए, वे आनेवाली अनेक शताब्दियों तक कई पीढ़ियों का मार्गदर्शन करती रहेंगी.
विवेकानंद जी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर रवींन्द्रनाथ टैगोर ने एक बार कहा था कि यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानंद को पढ़िए. उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पाएँगे, नकारात्मक आपको कुछ भी नहीं मिलेगा.
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विवेकानंद के अनमोल वचन
जानिए स्वामी विवेकानंद के ऐसे 5 अनमोल विचार, जो आपके जीवन में एक गहरी छाप छोड़ सकते हैं.
1. उठो जागो और तब तक रुको नहीं जब तक कि तमु अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर लेते।
2. ज्ञान स्वयं में वर्तमान है, मनुष्य केवल उसका अविष्कार करता है.
3. पढ़ने के लिए जरूरी है एकाग्रता, एकाग्रता के लिए जरूरी है ध्यान. ध्यान से ही हम इन्द्रियों पर संयम रखकर एकाग्रता प्राप्त कर सकते हैं.
4. पवित्रता, धैर्य और उद्यम- ये तीनों गुण मैं एक साथ चाहता हूं.
5. जब तक जीना, तब तक सीखना, अनुभव ही जगत में सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है.

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