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Uttarakhand Foundation Day : 20 सालों तक अंधेरे के बाद निकला उत्तराखंड का सूरज, लेकिन क्या पूरा हुआ मकसद ?

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Uttarakhand Foundation Day : राज्य गठन में सैकड़ों ने दिया बलिदान

Uttarakhand Foundation Day : 9 नवंबर 2000… वो दिन जब छोटे से राज्य उत्तराखंड का पहला सूरज निकला. विरोधियों ने तब शायद इस बात की कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि किसी दिन उत्तराखंड नाम का कोई अलग राज्य भी बनेगा

20 साल के लंबे संघर्ष के बाद उत्तराखंड के वीरों ने अपनी ताकत का अहसास सबको करा दिया, लेकिन अब यह सवाल उठना लाजिमी है कि जिस मकसद से राज्य की मांग की गई थी, क्या वो सच में पूरी भी हो रही है या नहीं.
आजादी से पहले ही उठने लगी थी उत्तराखंड की मांग
उत्तराखंड राज्य की पहली मांग 1937 में गढ़वाल से उठी थी. मगर इस मांग को आजादी के बाद संयुक्त प्रांत के मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत ने पणिकर आयोग के समक्ष खारिज कर दिया.
इसके पीछे उनका तर्क था कि उत्तराखंड में अभी इतने संसाधन नहीं है कि वो अलग राज्य के रूप में स्थापित हो सके.
गोविंद बल्लब पंत के बाद कांग्रेस के बड़े नेता एनडी तिवारी भी उत्तराखंड के नए राज्य बनने के खिलाफ थे, तिवारी ने तो यहां तक बोल डाला था कि उत्तराखंड राज्य उनकी लाश पर ही बनेगा.
हालांकि एनडी तिवारी ने उत्तराखंड की पहली निर्वाचित सरकार के मुख्यमंत्री बनकर सत्ता भोगी थी.
इसके बाद 1996 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा ने लालकिले से उत्तराखंड राज्य बनाने की घोषणा की, तो उसके बाद से राज्य की मांग पर धीरे-धीरे हामी भरती चली गई.
फिर अंत में 9 नवंबर 2000 को वो दिन भी आ गया जब तत्कालीन पीएम अटल बिहारी वाजपाई ने नए राज्य उत्तराखंड की आधिकारिक तौर पर घोषणा कर डाली.
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उत्तराखंड गठन के लिए आंदोलन
आंदोलन में गई सैकड़ों जानें, नहीं बख्शा गया मां-बहनों की आबरू
उत्तराखंड के नए राज्य बनने की मांग तो आजादी से पहले ही उठने लगी थी मगर इसने आंदोलन का रूप तब लिया जब मई 1979 में उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी)  का गठन हुआ.
इस दल की स्थापना गढ़वाल के गांधी के नाम से जाने वाले क्रांतिकारी इंद्रमणि बडोनी के संरक्षण में की गई थी.
इंद्रमणि बडोनी ने सेनापति की भूमिका में प्रदेश की जनभावनाओं के अनुरूप आंदोलन की रूपरेखा तय करते रहे और राजनीतिक व अन्य स्वार्थों से दूरी बनाए रखी. यही कारण था कि यूकेडी को प्रदेशभर से जबरदस्त समर्थन मिलता रहा.
लेकिन तभी सितंबर 1994 को खटीमा गोलीकांड से उत्तराखंड आंदोलन हिंसक हो गया. पुलिस द्वारा आंदोलनकारियों को रोकने के लिए चलाई गई गोलियों में 6 लोग शहीद हो गए.
इसके बाद मसूरी गोलीकांड, देहरादून गोलीकांड, कोटद्वार कांड, श्रीयंत्र टापू (श्रीनगर) कांड जैसे कई ऐसे मौके आए जब पुलिस ने आंदोलकारियों को रोकने के लिए हिंसा का प्रयोग किया.
मगर इन सब के बीच रामपुर तिराहा (मुज्जफरनगर) कांड उत्तराखंड आंदोलन का एक ऐसा घाव है, जो शायद कभी नहीं भरेगा. आज भी रामपुर तिराहा कांड का नाम जहन में आते ही हर आदमी का लहु खौल उठता है.
आंदोलन को कुचलने के लिए वो इतने नीचे गिर गए कि उन्होंने उत्तराखंड की मां-बहनों की इज्जत पर भी तरस नहीं खाया और जो दिखी उसके साथ दुष्कर्म कर डाला. यही नहीं जिसने उन्हें बचाने की कोशिश की तो उसे भी गोलियों से भुन डाला.
इसके बाद  से 2 अक्टूबर का दिन उत्तराखंड में काला दिवस के रूप में मनाया जाता है.
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17 सालों में उत्तराखंड ने क्या खोया, क्या पाया
किसी भी राज्य की शिक्षा व्यवस्था वहां की तरक्की की नींव मानी जाती है. लेकिन उत्तराखंड में शिक्षा व्यवस्था निजी संकट के दौर से गुजर रही है.
सरकारी स्कूलों में शिक्षक हैं तो बच्चे नहीं, बच्चे हैं तो शिक्षक नहीं. पहाड़ के सरकारी स्कूलों में कोई शिक्षक जाने को तैयार नहीं है. यही हाल स्वास्थ्य सेवाओं का भी है.
हर सरकार अपने कार्यकाल में मुख्यमंत्री के नाम से नई स्वास्थ्य बीमा योजना निकालती रहती हैं, लेकिन गरीब को लाभ ही नहीं मिल पाता.
वहीं, अलग राज्य बनने पर भी युवाओं के बीच बेरोजगारी के आकड़े बढ़ते जा रहे हैं . पहाड़ में तेजी से पलायन हो रहा है, खेती में भी लोगों का रूझान कम होता जा रहा है.
आंदोलनकारियों की गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाने की जनभावना के पीछे मुख्य मकसद यही था कि विकास को पहाड़ों तक पहुंचाया जा सके.
मगर सत्ताधारी नेतागण को देहरादून से इतना प्यार हो गया है कि अब वो यहां से कहीं जाना ही नहीं चाहते.
नेता जी को प्रदेश हित से प्यारा लागे सत्ता मोह
छोटे से राज्य उत्तराखंड ने पिछले 17 सालों में 9 मुख्यमंत्री देख लिए. इससे समझा जा सकता है कि उत्तराखंड के राजनेताओं में सत्ता का मोह किस कदर हावी है.
गौर करने वाली बात यह है कि अभी तक मुख्यमंत्री के तौर पर एनडी तिवारी ही अपने पांच साल का कार्यकाल पूरा कर पाए हैं. बाकी सीएम तो अभी तक एक-दो साल से ज्यादा टिक ही नहीं पाए .

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