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किसानों की फसल नहीं होगी खराब, कृषि वैज्ञानिकों ने इजात किए जैविक टीके

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सूचना एवं प्रौद्योगिकी के युग में तकनीक का हर क्षेत्र में अहम रोल है. लेकिन कृषि प्रधान देश में आज भी करोड़ों किसान ऐसे हैं, जो कृषि तकनीक की जानकारी न होने के कारण कृषि को अभिशाप समझ लेते हैं.
इसका मुख्य कारण यह है कि भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी किसानों को आधुनिक खेती के तौर-तरीकों की जानकारी नहीं मिल पाती है, जिसके कारण उन्हें फसलों के खराब होने की असल वजह का पता नहीं चल पाता. और ऐसे में वे खेती से मुंह फेरना ही उचित समझते हैं.

गौरतलब है कि आज विज्ञान के क्षेत्र में जिस तरीके से विकास हुआ है, उस गति से कृषि का भी विस्तार होता गया. आज कृषि वैज्ञानिकों ने फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले विभिन्न प्रकार के कीटों को नष्ट करने के लिए कीटनाशक दवाओं व जैविक टीके तैयार किए हैं, जिससे फसल को सुरक्षित बनाया जा सके.

जाने, विभन्न प्रकार के जैविक टीकों के बारे

नील हरित शैवाल टीका

धान में काफी लाभकारी है, यह नत्रजन(नाइट्रोजन) के अलावा जैविक कार्बन एवं पादप वृद्धि करने वाले पदार्थ भी उपलब्ध कराता है. एक एकड़ की धान की फसल को उपचारित करने के लिए 500 ग्राम का एक पैकेट टीका काफी है.

अजोला टीका

यह एक आदर्श जैविक प्रणाली है. जो उष्ण दिशाओं में धान के खेत में वायुमंडलीय नत्रजन का जैविक स्थिरीकरण करता है. अजोला 25 से 30 किलोग्राम नत्रजन प्रति हेक्टेयर फसल को योगदान करता है.

हरी खाद

साल में एक बार हरी खाद उगाकर खेत में जोतकर कार्बनिक अंश को बनाए रख सकते हैं. हरी खादों में दलहनी फसलों, वृक्षों की पत्तियां खरपतवारों को जोतकर उपयोग किया जाता है. एक दलहनी परिवार की फसल 10-25 टन हरी खाद पैदा करती है. इसके जोतने से 60 से 90 किलोग्राम नत्रजन प्रति हेक्टेयर की दर से प्राप्त होती है.

ढैंचा

यह फसल 40 से 60 दिनों में जोतने लायक हो जाती है. यह 50 से 60 किलोग्राम नत्रजन की भी प्रति हेक्टेयर आपूर्ति करता है. बुवाई के लिए 30 से 40 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर डालने के बाद खेत को दो से तीन सिंचाई ही करनी पड़ती है.

कंपोस्ट टीका

इस टीके के प्रयोग से धान के पुआल का 6 से 9 सप्ताह के अंदर बहुत अच्छा कंपोस्ट बन जाता है. एक पैकेट के अंदर 500 ग्राम टीका होता है, जो एक टन कृषि अवशेष को तेजी से सड़ाकर कंपोस्ट बनाने के लिए काफी है.

राइजोबियम टीका

राइजोबियम का टीका दलहनी, तिलहनी एवं चारे वाली फसलों में प्रयोग होता है. ये 50 से 100 किलोग्राम नत्रजन प्रति हेक्टेयर का जैविक स्थिरीकरण कर सकते हैं. इससे 25 से 30 फीसदी फसल उत्पादन बढ़ता है.

एजोटोबैक्टर टीका

यह स्वतंत्र जीवी जीवाणु है. इसका प्रयोग गेहूं, धान, मक्का, बाजरा आदि, टमाटर, आलू, बैंगन, प्याज, कपास सरसों आदि में करते हैं. 15 से 20 किलोग्राम नत्रजन प्रति हेक्टेयर की बचत करता है. 10 से 20 प्रतिशत फसल बढ़ती है.

एजोस्पिरिलम टीका

इसका प्रयोग अनाज वाली फसलों में होता है. जैसे ज्वार, बाजरा, रागी, मोटे छोटे अनाजों एवं जई में होता है. चारे वाली फसलों पर भी लाभकारी होता है. 15 से 20 किलोग्राम नत्रजन प्रति हेक्टेयर बचत करता है. फसल चारा उत्पादन बढ़ता है.

फास्फोरस विलयी जीवाणु टीका

फास्फोरस पौधों के लिए मुख्य पोषक तत्व है. इस टीके के प्रयोग से मृदा में मौजूद अघुलनशील फास्फोरस घुलनशील होकर पौधों को उपलब्ध हो जाता है.