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Asia’s Cleanest Village : जानिए कैसे , भारत का ये गांव 14 साल से है एशिया का सबसे स्वच्छ गांव

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asia's cleanest village
मावलिननोंग गांव

Asia’s Cleanest Village : गांव वालों ने बनाए खुद के नियम

Asia’s Cleanest Village : प्रधानमंत्री मोदी के स्वच्छ भारत के सपने को पूरा करने के लिए देश का हर राज्य एड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है. मगर मेघालय में एक छोटा सा गांव ऐसा भी है जहां 29 साल पहले ही ये अभियान सफल हो चुका है.

आपको जानकर खुशी होगी कि ये गांव देश ही नहीं बल्कि पूरे एशिया महाद्वीप में 2003 से सबसे स्वच्छ गांव के रूप में बना हुआ है.
क्यों खास है ये गांव ? 
भारत-बांग्लादेश की सीमा पर मेघालय राज्य में बसा मावलिननोंग गांव की आबादी महज 500 है. यहां हर घर में साफ शौचालय, रोशनी से जगमगाती गलियां और पक्की सड़कें इस गांव की विशेषता है.
वहीं अगर बात सिर्फ सफाई की जाए तो इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पूरे क्षेत्र में कचरे के नाम पर पेड़ का पत्ता भी नजर नही आता. इस गांव की साफ सुथरी व्यवस्था देखकर यह कहना गलत नहीं होगा कि इस गांव ने पूरे देश में स्वच्छता की मिसाल कायम की है.
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गांव वालों ने बनाए खुद के नियम
गांववासियों ने गांव में स्वच्छता को लेकर खास सख्त नियम बना रखे हैं, अगर कोई भी सार्वजनिक क्षेत्र में जरा सा कचरा भी फेंकता नजर आता है, तो उससे भारी जुर्माना लिया जाता है. इसके लिए समिति बनाई गई है, जिसकी निगरानी गांव का प्रधान करता है.
वहीं, इस गांव के लोग पर्यावरण की रक्षा के प्रति भी काफी गंभीर हैं, आपको बता दें कि यह गांव पूरी तरह से पॉलीथीन फ्री है, करीब 5 सालों से इस गांव में पॉलीथीन का प्रयोग नहीं हो रहा है. यही नहीं गांव के लोगों ने कूडेदान भी बांस के बनाए हुए हैं.
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मावलिननोंग गांव
29 साल पुराना है गांव के स्वच्छता का इतिहास
29 साल पहले इस गांव में महामारी जैसे हालात थे. गांव में फैली गंदगी के कारण यहां बीमारियां अक्सर पनपती रहती थी.
जिसे देखकर पास के ही स्कूल के शिक्षक रिशोत खोंगथोरम से रहा नहीं गया. फिर उन्होंने गांव वालों को स्वच्छता के प्रति जागरूक करना शुरू किया. काफी मेहनत के बाद आखिरकार गांव वाले इसे लेकर सीरियस हुए और उन्होंने अपने घर और आस-पास साफ-सफाई रखनी शुरू कर दी .
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शिक्षक रिशोत यहीं नहीं रूके, बल्कि उन्होंने गांव के छोटे बच्चों को भी स्कूल भेजना शुरू किया, इसके बाद बच्चों ने शिक्षा ग्रहण करके गांव के विकास को और आगे ले जाने का काम किया.
गांव के वरिष्ठ सदस्य ऐनेस खोंगलामेत बताते हैं गांव की समिति ने 1988 में ही स्वच्छता अभियान शुरू किया था. सबसे पहला आदेश था कि गांव के लोग अपने पालतू जानवरों को घर पर ही बांधेंगे. अगर किसी का जानवर बाहर घूमता नजर आया तो उसके जरिए क्षेत्र में फैली गंदगी जानवर का स्वामी ही साफ करेगा.
दूसरा आदेश यह जारी हुआ था कि सभी परिवारों में शौचालय का निर्माण होगा, और इसका इस्तेमाल गांव का हर नागरिक करेगा.
फिर इसके बाद रसोई से निकलने वाले कचरे और गंदे पानी के निस्तारण की योजना अमल में लाई गई.
ऐनेस कहते हैं कि आज गांव के सभी 97 घरों के बागीचों में कंपोस्ट पिट बने हुए हैं. घरों के जैविक कचरे को कंपोस्ट पिट में डालकर खाद बनाई जाती है जो खेतों में काम आती है.
वहीं, अकार्बनिक कचरे को बांस के बॉक्स में इकट्‌ठा किया जाता है. जिसे महीने में एक बार शिलॉन्ग रीसाइकल के लिए भेजा जाता है.

साभार – डीएनए