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भारत में जलवायु परिवर्तन ने ली 60,000 किसानों की जानें-रिपोर्ट

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जलवायु परिवर्तन की वजह से चकरा देने वाले तापमान,सूखा,तूफान और अकाल ने भारत में अब तक हजारों किसानों  की जान ले चुका है.
यह जानकारी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज (पीएनएएस) ने अपनी एक प्रकाशित रिपोर्ट में दी. रिपोर्ट में कहा गया है कि दक्षिण एशियाई देशों में बढ़ते मौसम के दौरान 20 डिग्री सेल्सियस तापमान से ऊपर हर एक डिग्री सेल्सियस पर औसत 67 लोगों ने अपनी जान गंवाई है.
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के औसत तापमान में 2050 तक 3 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होने की संभावना है. जिसका मतलब है सैकड़ों अतिरिक्त लोगों की मौत की संख्या में इजाफा होना.
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 2050 तक जलवायु परिवर्तन के कारण भारत और दक्षिण एशियाई देशों में इतनी गर्म हवाएं चलेंगी कि यहां जी पाना नामुमकिन हो जाएगा.
भारत में किसानों को पहले से ही मौसमी आपदा ने नियमित रूप से प्रभावित कर रखा है. जिनमें अत्यधिक गर्मी औऱ फसलों को पानी ना मिल पाने के कारण सूखा पड़ना मुख्य है. हमारे देश में अब भी किसान फसलों को पानी देने के लिए प्राकृतिक जल संसाधन पर ही निर्भर हैं.
इस रिसर्च में शामिल तमा कार्लेटन ने जानकारी दी कि भारत में 30 साल के दौरान अब तक 60,000 किसानों की आत्महत्याएं जलवायु परिवर्तन की वजह से हुई हैं.
इस अध्यन से अलग बोस्टन में हार्वर्ड मेडिकल स्कूल से जुडे़ एक भारतीय मनोचिकित्सक और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ विक्रम पटेल ने कहा, “हम दुनिया को गर्म करने से रोक नहीं सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम आत्महत्या के लिए कुछ नहीं कर सकते”
उन्होंने कहा कि वर्तमान में आत्महत्या करने के कई कारण हैं. जिनमें खराब फसल की पैदावार, वित्तीय समस्याएं या सामुदायिक सहायता की कमी जैसे मुद्दे शामिल हैं.
इनमें से तो कुछ ने कर्जा ना चुका पाने के डर से कीटनाशक दवा पीकर अपनी जिंदगी खत्म कर ली.
कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने पिछले हफ्ते सांसद में खुद बताया कि 2016 में 11,458 किसान आत्महत्याएं कर चुके हैं उन्होंने स्वीकार्य किया कि पिछले 2 सालों में किसानों की आत्महत्यों की संख्या में लगभग 9 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है.
भारत के राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो ने पाया कि 2015 में 12,602 किसानों की आत्महत्याओं में आधे से ज्यादा (58 प्रतिशत) दिवालियापन, कर्जग्रस्त और अन्य कृषि संबंधी मुद्दों से प्रेरित थे.
इन आकडों के मुताबिक दुनिया की आत्महत्याओं में पांचवां हिस्सा भारत का होता है. जो कि वैश्विक आबादी के कई देश के अनुपात के बराबर है.