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No Suicide Village : महिलाओं ने हाथ में ली खेती की कमान तो बन गया यह गांव ‘नो सुसाइड जोन’

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No Suicide Village
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No Suicide Village : गांव में पहले किसान करते थे आत्महत्या

No Suicide Village : भारत में अगर आज कोई ऐसा वर्ग है जो सबसे ज्यादा शोशित है तो वह है हमारे देश का किसान.

वतन के गणमान्य से लेकर आम जन हर कोई किसानों की स्थिती पर बात तो करते हैं, मगर जब उस पर अमल करने की बात आती है तो यही लोग उन्हें ठेंगा दिखा देते हैं. इसका नतीजा देश में किसानों की खुदखुशी के बढ़ते आंकडें है.
कुछ साल पहले महाराष्ट्र के हिंगलबाड़ी गांव का भी ऐसा ही नजारा था. वहां भी मौसम और कर्जे की मार झेल रहे किसानों की खुदखुशी की संख्या हर दिन बढ़ती जा रही थी.
कुछ दिनों के अंतराल के बाद गांव के किसी ना किसी घर से रोन-धोने की आवाज आई ही जाती थी. जिससे परेशान होकर एक दिन वहां कि महिलाओं ने अपने उजड़ते सुहाग को बचाने के लिए एक तरीका खोज निकाला .
इस नए तरीके से वहां की महिलाओं ने कम पानी में फसल उगा कर ना सिर्फ अपने किसान पतियों को राहत दी बल्कि अपनी गांव की तस्वीर भी बदल दी.
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महिलाएं तय करती हैं फसल का रेट
फसल का भाव तय करने के लिए गांव की महिला किसानों ने अपना एक समूह बना रखा है जो खुद ही बाजार जाकर सप्लायर से बात करता है.
महिला किसानों के समूह की लीडर कोमलवती के पति अच्युत काटकटे कहते हैं कि उन्हें अपनी पत्नी के द्वारा किए जा रहे कामों पर बहुत गर्व है. उन्होंने कहा कि गांव की महिलाओं ने आर्थिक तंगी से परेशान हम पुरुषों को एक नई राह दिखाई है.
कम संसाधनों में खेती कैसे की जाए, इसका तरीका उन्होंने जिस तरह निकाला है उसे देखकर गांव के सभी पुरूष इन महिलाओं को फॉलो करने लगें हैं.
लगातार हो रही खुदखुशी को रोका
गांव के ही विष्णु कुमार ने बताया कि हमारे गांव में भी पानी की कमी और बैंक लोन की किस्त ना जमा कर पाने की वजह से किसान लगातार खुदकुशी कर रहे थे. लेकिन जब से गांव की महिलाओं ने मोर्चा संभाला है तब से गांव का कोई भी किसान अब कर्ज की परेशानी से खुदकुशी नहीं करता.
उन्होंने कहा कि इन महिलाओं की सूझबूझ के कारण ही आज हमारे गांव में खुशियां वापस लौट आई हैं.
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शुरुआत में छोटे से हिस्से पर की खेती
महिला किसान रेखा शिंडे बताती हैं कि बारिश न होने से खेतों में सूखा पड़ जाता था. जिस वजह से किसान बैंकों से लिए हुए अपने कर्ज को चुकाने में असमर्थ रहते थे, फिर आखिर में जब कहीं से कोई राह ना दिखती तो वो मौत को गले लगा लेते थे.
रेखा ने बताया कि यह सब दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा था. जिससे परेशान होकर हम गांव की महिलाओं ने सोचा कि क्यों न हम खुद खेती करके देखें.
उन्होंने कहा कि शुरूआत में हमने खेती के लिए एक छोटा सा जमीन का टुकड़ा मांगा जिसे पहले तो हमें देने से मना किया मना किया गया मगर बाद में बहुत समझाने के बाद हमें खेती के लिए जमीन दे दी गई. जहां हमने अपनी नई तकनीक से कम पानी में भी खेती करके बढ़िया फसल की पैदावार कर के दिखाया.
जिसके बाद गांव के सभी किसानों ने इसी तकनीक से अपनी फसलों को उपजाना शुरू किया.
उन्होंने कहा कि जब हमारे गांव में फसल अच्छी होने लगी तो हमने बैंक के पैसे अदा करना भी शुरू कर दिया. इसके बाद तो हमारा आत्मविश्वास और बढ़ गया और हम सभी ने गांव में सब्जियां उगाने का व्यवसाय भी शुरू कर दिया .
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जागरुकता से बदली गांव की दशा
समूह की अन्य सदस्य मंजूश्री ने बताया कि सब्जियां उगाने और बेचने के बाद हालत सुधरी तो हम महिलाओं ने उस्मानाबाद जाकर सरकारी योजनाओं के बारे में जानकारी हासिल की.
हालांकि शुरूआत में सरकारी कार्यालय में तैनात बाबूओं ने हमें किसी भी तरह से खेती और किसानी से संबंधित स्कीम के बारे में बताने में असमर्थता जताई. लेकिन हमने भी हिम्मत नहीं हारी और हम लगातार सरकारी योजनाओं की जानकारियां जुटाने में लगे रहे.
इसी का नतीजा है कि आज हमारे गांव में 200 स्वयं सहायता समूह सुचारू रूप से चल रहे हैं जिसमें 265 महिला सदस्य हैं.
आपको बता दें कि ब्यूटी पार्लर, पोलट्री फॉर्म, बकरी पालन और दुग्ध व्यवसाय के जरिए इन महिला किसानों के समूह का टर्नओवर अब 1 करोड़ तक पहुंच गया है.
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इस नई सोच का किया जा चुका है सम्मान
गांव में महिलाओं के खेती करने और स्वयं सहायता समूह की स्थापना से गांव की आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए इन महिलाओं को 2017 का सीआईआई अवार्ड भी मिल चुका है.
यहीं नहीं इन्हें नीति आयोग के द्वारा दिया जाने वाले पुरस्कार से भी नवाजा जा चुका है.

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