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Traditional Farming : बिना किसी कीटनाशक प्रयोग किए केरल का यह कबीला कर रहा पारंपरिक खेती

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 Traditional Farming : आर्टिफिशयल कीटनाशकों का नहीं करते प्रयोग

Traditional Farming : 40 वर्षीय गंगाधरण के 50 एकड़ खेत में आप को केले के पेड़ से लेकर नारियल के पेड़ लगे दिखाई देंगे. धान की लहलहाती फसल के साथ साथ आप यहां पर आमला, जैकफ्रूट की खेती भी देख सकते हैं.

आप सोच रहें होंगे कि इसमें कौन सी नई बात है लेकिन हम आपको बता दें कि गंगाधरण आज तक बिना किसी  कीटनाशकों के प्रयोग से अपनी फसलों को उपजाते हैं.
गंगाधरण किसान हैं और कुरुचिया जनजाति से ताल्लुक रखते हैं. यह जनजाति केरल के वायानाड और कन्नूर जिलों में पारंपरिक खेती करती है.
वायनाड केरल की जैव विविधता(बॉयोडायवरसिटी) के हिसाब से बहुत महत्तवपूर्ण हैं क्योंकि केरल के 36 जनजातीय समुदायों में से 13 वायनाड जिले में ही रहते हैं.
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पारंपरिक खेती से उगाते हैं फसल
इस 50 एकड़ जमीन की जिम्मेदारी कबीले के 15 लोगों के पास जिनमें से एक गंगाधरण भी है. उनका यह कबीला कलापिटा के बाहरी इलाके के गांव अनरेमुत्तुल्ले में बसा हुआ है.
आज से तरकरीबन 50 साल पहले इस कबीले के लगभग 80 लोग गांव के बाहर आकर बसे थे. और यहां पर वो अपने पारंपरिक तौर तरीके से खेती करने की शुरूआत की थी . हालांकि आज बस तीन घर में रहने वाले 15 लोग ही इस कबीले का हिस्सा हैं.
आर्टिफिशयल कीटनाशकों का नहीं करते प्रयोग
गंगाधरण ने बताया कि वह फसलों की तादाद बढाने के लिए आर्टिफिशयल कीटनाशकों और फर्टीलाइजरों का कभी भी इस्तेमाल नहीं करते .
उन्होंने बताया कि यहां सब कुछ प्राकृतिक तौर-तरीके से किया जाता है. गंगाधरण बताते हैं कि चोमला, गन्थकाशला और अथिरा ये तीन प्रकार के चावल इस गांव में उगाए जाते हैं और इसके लिए गाय के गोबर और पानी को ही खाद के तौर पर प्रयोग किया जाता है.
गंगाधरण ने बताया कि उनकी फसल की सिंचाई के लिए लिया जाने वाला पानी का स्त्रोत उनके कुलदेवता के रहने के स्थान पर है जिसका उनके कबीले में बहुत महत्व माना जाता है.
इसी स्त्रोत से यह पानी जंगलों से होते हुए गांव के तलाबों में पहुंचता है औऱ वहां से फिर कृषि कार्य के लिए पानी लिया जाता हैं. इसके अलावा इन तालाबों में मछली पालन का भी कार्य किया जाता है. जिनमें से कुछ भोजन बनती है.
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एक दूसरे का बटाते हैं हाथ
अनरेमुट्टिली में जनजाति के प्रत्येक व्यक्ति एक दूसरे के क्षेत्र में काम करते हैं और एक दूसरे कि फसलों की कटाई छटाई सबमें में मदद करते हैं.
गौरतलब है कि एक दशक पहले कबीले के सभी सदस्य साझा तौर पर खेती करते थे. जिसका आधिकारिक हक थारवाडु ( घर का सबसे पुराना सदस्य) के पास होता था. लेकिन अब परिवारों में जमीन विभाजित हो गई है और लोग अपने हिस्से की खेती करते हैं.
महिलाओं को मिला काम
गंगाधरण बताते हैं कि इन दिनों महिलाओं ने भी दिन में मनरेगा में काम शुरू करना शुरू कर दिया है, जिससे थोड़ी आमदनी और बढ़ गई है. गंगधरण कहते हैं कि अब बच्चे स्कूल जाने लगे हैं और हम लोग भी उनके लिए एक अलग भविष्य की उम्मीद कर रहे हैं.
अपने पुरखों से सीखी हुई पारंपरिक खेती को आज के समय में इस कबीले ने बड़े ही बेहतरीन ढ़ंग से सहेज कर रखा है, जो अपने आप में देश के किसानों को प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल से खेती करने की सीख देता है.

साभार – इंडियन एक्सप्रेस
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