कॉलेजों में रैगिंग के प्रति छात्रों के अंदर बढ़ रहा रुझान- रिपोर्ट

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देश के कॉलेजों में रैगिंग के प्रति छात्रों का रूझान तेजी से बढ़ना एक चिंता का विषय है. कॉलेजों में ऐसे हालत तब बन रहे हैं जब देश की ज्यादातर आबादी इसके खिलाफ अपनी आवाज उठा रही है.
दरअसल सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त एक पैनल ने जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मैन्टल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेस के साथ मिलकर पूरे भारत में छात्रों की होने वाली रैगिंग पर एक सर्वे कराया था. देश के 37 प्रमुख कॉलेजों में किए गए इस रिसर्च का रोमांचक निष्कर्ष विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने जारी किए हैं.

सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त पैनल ने लगभग देश भर के 10,632 विद्यार्थियों को अपने इस अध्यन में शामिल किया था. छात्रों के बीच किए गए इस मनोवैज्ञानिक अध्ययन में रैगिंग के प्रति उनके अनुभव के बारे में पूछताछ की गई थी.

इस अध्यन में छात्र कॉलेजों में होने वाली रैगिंग को दो हिस्सों में बांटते नजर आए. उन्होंने हल्की रैगिंग और गंभीर रैगिंग का उल्लेख करते हुए बताया कि वह हल्की रैगिंग का आनंद उठाते हैं. वहीं गभीर रैगिंग शुरू में खराब लगती है लेकिन बाद में यह भी हमें ठीक महसूस होने लगती है.
रैगिंग को लेकर लगभग 36% छात्रों का मानना ​​है कि रैगिंग ने उन्हें समाज की कठोर परिस्थितियों का सामना करने के लिए तैयार किया है. वहीं 33% छात्रों का कहना है की रैगिंग के माध्यम से उन्हें कॉलेज में दोस्त बनाने का मौका मिला. इसके अलावा रैगिंग के दौरान सीनियर्स से मिलने वाली जानकारी ने उन्हें अपने कैरियर को बेहतर बनाने में भी काफी मदद की.
छात्रों ने कहा कि उन्हें रैगिंग से कोई शिकायत नहीं है.यह हमारा बिल्कुल भी उत्पीड़न नहीं करती है. कुछ चंद अपराधिक घटनाओं के कारण कॉलेजों में सालों से चली आ रही इस परंपरा को खत्म नहीं करना चाहिए. अध्यन में लगभग 84 प्रतिशत छात्र-छात्राएं इसे जारी रखने के पक्ष में दिखे.
विद्यार्थीओं की तरफ से रैगिंग को लेकर बढ़ते रूझान अब एससी पैनल के लिए चिंता का विषय बन गए हैं . उन्होंने इस अध्यन के निष्कर्ष में माना है कि छात्रों द्वारा रैगिंग को पूरी स्वीकृति दी जा रही है.
मगर अध्यन में शामिल लोग ये समझ नहीं पा रहे कि कैसे कॉलेज में हिंसा की इतनी घटनाओं के बाद भी देश भर के शैक्षिक संस्थानों में इसे समर्थन दिया जा रहा है.
वहीं दूसरी तरफ छात्रों के इस व्यवहार को स्वीकार करना उनके माता-पिता और शिक्षकों के लिए भी एक परेशानी का सबक बन गया है.
इस मामले में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मैन्टल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेस के प्रोफेसर डॉ शेखर शेषादरी ने कहा कि छात्र बड़ी तादाद में रैगिंग को स्वीकार कर रहे हैं.क्योंकि वह अब इसके आदि हो चुके है. वो कॉलेज में आने से पहले ही दिमागी तौर पर खुद को इस प्रक्रिया से गुजरने के लिए तैयार कर लेते हैं.
उन्होंने कहा कि इसे रोकने के लिए कॉलेजों के हॉस्टल में वार्डन की भूमिका को मजबूत करने की जरूरत है .
उन्होंने संस्थानों को भी स्पष्ट रूप से इस अमानवीय व्यवहार से दूर रहने को कहा. डॉ शेखर शेषादारी ने स्पष्ट रूप से कॉलेजों को यह सुनिश्चित करने को कहा कि वो लिंग, जाति और धर्म के आधार पर कॉलेज में किसी का भी उत्पीड़न या भेदभाव ना होने दे.
साभार- टाइम्स ऑफ इंडिया