भारत में स्वास्थ्य संबंधित देखभाल के आंकडे़ चिंताजनक- सर्वे

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21 वीं सदी का एक भारत मंगल पर पहुंच गया वहीं दूसरा अब तक स्वास्थ्य देखभाल की चुनौतियों का सामना कर रहा है.
हाल ही में हुए राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (एनएसएस) के आर्थिक सर्वेक्षण में पाया गया है कि देश में सार्वजनिक सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने वाले लोगों में भारी गिरावट आई है.
एनएसएस के 71 वें दौर (जनवरी 2014 से जून 2014) में किए गए सर्वेक्षण में पाया गया है कि ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में रह रहे लोग अब सरकारी इलाज कराने की बजाए निजी अस्पतालों और डॉक्टरों से इलाज कराने को ज्यादा प्राथिमकता दे रहे हैं.
इस सर्वेक्षण के अनुसार  72 प्रतिशत ग्रामीण और 79 प्रतिशत शहरी वर्ग के लोगों का इलाज निजी क्षेत्र के अस्पतालों में किया जा रहा है. वहीं रिपोर्ट का मानना है कि लोगों ने अपनी जेब खर्च से ज्यादा के रुपये को निजी इलाज में खर्च किया है. जो कि सार्वजनिक सरकारी इलाज के मुकाबले बहुत ज्यादा है.
आकड़ों के मुताबिक भारत स्वास्थ्य के क्षेत्र में ओओपी (जेब से ज्यादा) खर्च करने के मामले में तेजी से उभरा है. जिसमें ब्रिक्स देशों की (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) की स्वास्थ्य अर्थव्यवस्था शामिल है. भारत में साल 2008 के बाद से लगातार इलाज के लिए ओओपी में 60 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. जबकि ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे विकासशील देशों में ओओपी खर्च 10 प्रतिशत से भी कम है.
गौरतलब है कि भारत जैसे बड़े देश में स्वास्थ्य पर जेब से ज्यादा खर्च समाज के गरीब वर्गों की कमजोरी और असमानताओं को उजागर करता है. गरीबों के लिए इतनी अधिक संख्या में ओओपी खर्च उनकी रोजाना की आय को भी प्रभावित करता है. जिससे उनकी आर्थिक दशा कभी सुधर नहीं पाती और वो हमेशा तंगी से भरे हालातों का सामना करते रहते हैं.
सर्वेक्षण में आबादी के कम आय वाले समूहों के लिए गुणवत्ता वाली सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के प्रावधान के विस्तार करने पर विशेष जोर देने के लिए कहा गया है.
हालांकि भारत में इलाज के दौरान सबसे ज्यादा खर्च मरीजों को उनकी दवाओं पर करना पड़ता है. और भारत में पेटेंट दवाओं वाले प्रदाताओं नें स्वास्थ्य क्षेत्र में एकाधिकार स्थापित कर रखा है. जो कि मरीजों को महंगी दवाएं देकर अतिरिक्त लाभ कमाते हैं.
सर्वेक्षण में इस स्थिति से निपटने के लिए भी सरकार को कुछ महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए है. जिसमें प्रमुख सरकार को पेटेंट की दवाओं की मांग को कम करने को कहा गया है.  इसके अलावा दवाओं की लागत को कम करने के लिए जेनरिक दवाओं का ज्यादा से ज्यादा उत्पादन करनेनकी भी आवश्यकता बताई है .