देश की उच्च अदालतों में 6 लाख केस 10 साल से भी ज्यादा समय से पड़े हैं लंबित- रिपोर्ट

उच्च अदालतों में लंबित केस

देश के विभिन्न उच्च अदालतों में लगभग 6 लाख केस 10 साल या उससे भी अधिक समय से लंबित पड़े हुए हैं.

एक सर्वेक्षण के आधार पर जारी किए गए आकड़ों के अनुसार सबसे ज्यादा लंबित मामले बॉम्बे हाईकोर्ट में है जबकि दूसरे स्थान पर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का नंबर आता है.
राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड द्वारा देशभर के कुल 24 में से 20 उच्च न्यायलयों से एकत्र किए गए इन आकड़ों के आधार पर यह रिपोर्ट तैयारी की गई है.
आपको बता दें कि पिछले साल 2016 के अंत में जारी किए गए इन डाटा में देश के सभी हाईकोर्ट्स में कुल 40.15 लाख केस लंबित बताए गए थे, जिनमें से 19.45% केस दस साल या उससे भी ज्यादा पुराने थे.
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क्या कहते हैं आकड़े
राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड के मौजूदा आंकड़ों के मुताबिक देश के 20 उच्च न्यायलय में 10 साल से पुराने 5,97,650 केसों में आज भी सुनवाई जारी है. हालांकि इस सर्वेक्षण में इलाहाबाद हाई कोर्ट सहित तीन और कोर्ट को शामिल नहीं किया गया है.
लंबित केसों के मामलों में इन 20 न्यायलयों की लिस्ट में से 1,29,063 मुकदमों के साथ बॉम्बे हाईकोर्ट पहले स्थान पर है जहां 96,546 सिविल, 12846 क्रिमिनल और 19621 रिट पिटीशन पर लंबे समय से सुनवाई चल रही है.
इसके बाद दूसरे नंबर पर हरियाणा एवं पंजाब हाई कोर्ट का नाम है जहां कुल 99,625 केस पेंडिंग है. जिनमें 64,967 सिविल, 13,324 क्रिमिनल और 21,334 रिट पिटीशन शामिल हैं.
जबकि तीसरे स्थान पर कलकत्ता हाईकोर्ट का नंबर आता है जहां कुल 74,315 केस 10 साल से ज्यादा समय से लंबित है यहां सिविल के 40,259 क्रिमिनल के 14898 और 21,334 रिट पिटीशन अटकी हैं.
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लंबित केसों पर चीफ जस्टिस भी हो चुके हैं भावुक
आपको याद होगा कि पिछले साल अप्रैल 2016 में देश के पूर्व चीफ जस्टिस टी.एस ठाकुर अदालतों में चल रहे लंबित मुकदमों के मामले में बात करते हुए प्रधानमंत्री और देश के तमाम मुख्यमंत्रियों के सामने भावुक हो गए थे.
श्री ठाकुर ने उस समय अपने संबोधन में सरकार से यह मांग करी थी कि केसों की बढ़ती संख्या के मद्देनजर जजों की संख्या में भी बड़े पैमाने पर इजाफा किया जाना चाहिए. उन्होंने बढ़ते केसों की संख्या का कारण जजों की कमी को भी बताया था.
अपने भावुक भाषण में जस्ट‍िस ठाकुर ने आरोप लगाया कि जुडिशरी की मांग के बावजूद कई सरकारें इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाने में नाकाम रहीं हैं.