National Press Day : प्रेस की आजादी के लिए भाजपा सरकार प्रतिबद्ध – पीएम मोदी

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National Press Day : राजस्थान पत्रिका ने विरोध में नहीं लिखा आज संम्पादकीय

National Press Day : प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रीय प्रेस दिवस के मौके पर देश के तमाम मीडिया कर्मियों को शुभकामनाएं दी हैं .

उन्होंने अपने शुभकामना संदेश में स्वतंत्र प्रेस को लोकतंत्र के जीवन की आधारशीला बताया है. इसके अलावा उन्होंने भरोसा दिलाया कि उनकी सरकार प्रेस की स्वतंत्रता बनाये रखने के लिए पूर्ण रूप से प्रतिबद्ध है.
प्रधानमंत्री ने अपने ट्वीट में लिखा कि स्वतंत्र प्रेस जीवंत लोकतंत्र की आधारशिला है, हम सभी रूपों में प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए पूर्ण रूप से प्रतिबद्ध हैं. और आशा करते हैं कि हमारी मीडिया का प्रयोग 125 करोड़ भारतीयों के कौशल, शक्ति और सृजनात्मकता को दिखाने के लिए होगा.
यही नहीं उन्होंने मीडिया, खास तौर से संवाददाताओं और कैमरापर्सन के कठिन परिश्रम की भी प्रशंसा की, जो मौके पर पहुंचकर अथक परिश्रम करते हैं और राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय खबरों को उनका आकार देते हैं.
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क्यों मनाया जाता है प्रेस दिवस
राष्ट्रीय प्रेस दिवस 1966 से प्रति वर्ष 16 नवंबर को मनाया जाता है. प्रथम प्रेस आयोग ने भारत में प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा एवं पत्रकारिता में उच्च आदर्श कायम करने के उद्देश्य से एक प्रेस परिषद् की कल्पना की थी.
इसके तहत 4 जुलाई 1966 को भारत में प्रेस परिषद् की स्थापना की गई जिसने 16 नंवबर 1966 से अपना विधिवत कार्य करना शुरू किया. तभी से लेकर हर साल 16 नवंबर को राष्ट्रीय प्रेस दिवस के रूप में मनाया जाता है.
राष्ट्रीय प्रेस दिवस पत्रकारों को सशक्त बनाने के उद्देश्य से स्वयं को फिर से समर्पित और अपने कर्तव्यों का निर्वाहन करने का अवसर प्रदान करता है.

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राजस्थान पत्रिका ने नहीं लिखा आज संम्पादकीय
राजस्थान के प्रमुख हिंदी दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका ने वसुंधरा सरकार की नीतियों के प्रति अपना विरोध दर्ज कराते हुए राष्ट्रीय प्रेस दिवस के मौके पर अपना संपादकीय कॉलम खाली छोड़ दिया है.
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अपने संपादकिय पेज को खाली छोड़ते हुए वहां एक मोटे काले बॉर्डर से घेरते हुए अखबार ने लिखा है कि आज राष्ट्रीय प्रेस दिवस यानी स्वतंत्र और उत्तरदायित्वपूर्ण पत्रकारिता का दिन है.
लेकिन राजस्थान में राज्य सरकार द्वारा बनाए काले कानून से यह खतरे में है. संपादकीय खाली छोड़कर हम लोकतंत्र के हत्यारे काले कानून का पूर्ण मनोयोग से विरोध करते हैं.
गौरतलब है कि हाल ही में वहां की सरकार ने एक विधेयक लाकर सेवानिवृत्त एवं सेवारत न्यायाधीशों, मजिस्ट्रेटों और लोकसेवकों के खिलाफ ड्यूटी के दौरान किसी भी कार्रवाई को लेकर मीडिया रिपोर्टिंग पर भी लोक लगा दी थी.
विधेयक के अनुसार, मीडिया अगर सरकार द्वारा जांच के आदेश देने से पहले इनमें से किसी के नामों को प्रकाशित करता है, तो उसके लिए 2 साल की सजा का प्रावधान है.

साभार – द वायर
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