NFHS Survey 2018 : देश में बढ़ रही बेटियां, 79% महिलाएं और 78% पुरूषों ने माना घर में बेटी है जरूरी

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NFHS Survey 2018 : पिछडों और गरीबों के बीच बेटियों की चाहत ज्यादा

NFHS Survey 2018 : भारत में हाल ही में हुए एक सर्वे के ऑकड़ों नें यह सामने आया है कि देश के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में संतान के रूप में लोगों के अंदर बेटियों की चाहत में बढ़ोतरी हुई है.

नेशनल फैमिली एंड हेल्थ सर्वे (NFHS) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक बेटियों को लेकर भारतीय समाज की सदियों पुरानी सोच में सकारात्मक बदलाव देखने को मिला है.
इस सर्वे के अनुसार 15 से 49 साल की 79% महिलाओं और 15 से 54 वर्ष के 78% पुरुषों ने अपनी संतान के रुप में एक बेटी की चाहत को स्वीकारा है.
खास बात यह है कि बेटी की इच्छा रखने वाले लोगों में अनुसूचित जाति, जनजाति, मुस्लिम और ग्रामीण क्षेत्रों के अलावा आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लोगों की संख्या सबसे ज्यादा है.
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क्या कहता है NFHS का सर्वे
सर्वे के मुताबिक गरीबी रेखा से नीचे के तबके और निम्न मध्वर्गीय परिवारों की 86% महिलाएं और 85% पुरुष बेटियों के जन्म को लेकर सबसे ज्यादा सहज और उत्साहित पाए गए .
वहीं मुस्लिम, दलित और आदिवासी समुदायों के परिवारों ने बाकी समुदायों के मुकाबले घर में बेटी के पैदा होने को काफी अच्छा बताया है.
यदि हम बात साल 2005-06 के आंकड़े की करें तो बेटियों की चाहत केवल 74 फीसदी महिलाओं और 65 फीसदी पुरुषों को ही थी.
गौरतलब है कि बेटियों के प्रति महिलाओं की बढ़ती चाहत की वजह शिक्षा के बढ़ते स्तर को भी माना गया है. 12वीं पास 85% महिलाओं ने जहां बेटी पैदा होने को ज़रूरी माना है वहीं इससे कम शिक्षित 72% महिलाओं ने भी घर में बेटी की महत्वता को समझा है.
वहीं पुरूष समाज में 74% पढ़े-लिखे और 83% कम शिक्षित पुरूषों ने भी संतान के तौर पर बेटियों को पहली पसंद बताया है.
मुस्लिम, दलित और गरीब बेटी के लिए सबसे आगे
सर्वे के मुताबिक लगभग 81% मुसलमान परिवारों ने घर में बेटियों का होना बेहद ज़रूरी माना है जबकि 79% बौद्ध धर्म के लोग और 79% हिंदू महिलाओं का मानना है कि घर में कम से कम एक बेटी जरूर होनी चाहिए.
अगर जातिय समुदाय की बात करें तो 81% दलित, 81% आदिवासी और 80% ओबीसी परिवारों की महिलाओं ने बेटी की चाहत जाहिर की है साथ ही 84% आदिवासी पुरुष और 79% दलित पुरुष भी बेटी की मंशा पाले हुए हैं.
वहीं अगर आर्थिक स्तर पर बेटियों की चाहत की बात करें तो 86% गरीब महिलाएं और 85% पुरुष कम से कम एक बेटी चाहते हैं, जबकि अमीरों में यह प्रतिशत 73 और 72 फीसदी का है.
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 हरियाणा ने समझा बेटी का महत्व
बेटियों के प्रति अपनी उदासीन छवि की पहचान बना चुके हरियाणा में जबरदस्त सुधार देखने को मिला है.
साल 2011 की जनगणना के अनुसार हरियाण में जहां 1000 लड़कों पर 834 लड़कियां थी तो वहीं वर्ष 2017 में 1000 लड़कों पर 914 लड़कियों का सर्वोच्च लिंग अनुपात दर्ज किया है.
इतमे कम समय में इस बेहतर सुधार का श्रे्य लोगों की बेटियों के प्रति बदलती सोच और प्रधानमंत्री की 2015 में शुरू की गई बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान को जाता है.
अब भी बेटों की चाह बरकरार
NFHS की रिपोर्ट में बेटे की इच्छा को लेकर भी सवाल किया गया था. जिसमें ये बात सामने निकल कर आई कि बेटों की चाहत अब भी बेटी से ज्यादा है. लगभग सभी कैटगरी में 82% महिलाएं और 83% पुरुष परिवार में कम से कम एक बेटा चाहते हैं.
इसके अलावा, महिलाओं और पुरुष दोनों वर्ग में लगभग 19% लोगों ने बेटियों की तुलना में बेटे की चाह ज्यादा जाहिर की है.  जबकि केवल 3.5% ही ऐसे लोग थे, जिन्हें बेटों की तुलना में अधिक बेटियां चाहिए.
वहीं देश के दो बड़े राज्य बिहार की 37% और यूपी की 31% महिलाएं अब भी बेटों को बेटियों से ज्यादा ज़रूरी समझती हैं.
बेशक हमारे देश में अब लोगों ने बेटियो की चाह को महसूस करना शुरू कर दिया है मगर अब भी समाज के कुछ वर्ग इससे अछूते हैं.