महात्मा गांधी के सपनों के विपरीत है मौजूदा शिक्षा प्रणाली- तुषार गांधी

कोटद्वार में ‘’महात्मा गांधी व आज की शिक्षा’’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में शिरकत करने पहुंचे महात्मा गांधी के प्रपौत्र तुषार गांधी ने मौजूदा शिक्षा पद्धति को गांधी जी के सपनों के बिल्कुल विपरीत बताया. उन्होंने कहा कि सेवा और आदर्श शिक्षक के जीवन के महत्वपूर्ण मूल्य हैं, परंतु दुर्भाग्य से आज शिक्षक में यह मूल्य कहीं गुम से हो गए हैं.
शिक्षक तानाशह की भूमिका में
 उन्होंने वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर कटाक्ष करते हुए कहा कि आज शिक्षक तानाशाह की भूमिका में नजर आ रहे हैं, जहां छात्र-छात्राओं को शिक्षक से सवाल पूछने का अधिकार नहीं दिया जाता है, यदि कोई छात्र मन में उठ रहे सवाल को पूछने का प्रयत्न भी करता है तो उसे संस्कारहीन कह डांटकर बैठा दिया जाता है. इससे उस बच्चे के मन में पनप रही जिज्ञासा व इच्छा मन में ही दफन होकर रह जाती है.
जिम्मेदारियों से बच रहें हैं शिक्षक
तुषार गांधी ने वर्तमान संदर्भ में शिक्षकों की भूमिका पर भी निसंकोच कटाक्ष करते हुए कहा कि शिक्षक भी आज अपने कर्तव्यों एवं जीवन के मूल्यों का ईमानदारी से निर्वहन नहीं कर रहे है. जिसके कारण  मंदिर रूपी विद्यालय की पवित्रता का महत्व कम हो रहा है. उन्होंने व्यंग में कहा कि विद्यालय में शिक्षा तो दी जाती है, लेकिन संस्कार नहीं, विद्या तो दी जाती है, लेकिन ज्ञान नहीं.  ऐसे में आप कैसे उम्मीद करते हैं कि युवा देश के विकास में योगदान देगा।
तालीम से बनेगी बात
तुषार गांधी ने कहा कि गांधी जी हमेशा ‘’नई तालीम’’ पर जोर दिया करते थे, जिसमें उन्होंने एक ऐसे माहौल की परिकल्पना की थी जहां शिक्षक और छात्र वर्ष में एक बार एक मंच में एक साथ अवश्य बैठें. छात्र शिक्षा के प्रति अपनी राय व रूचि को शिक्षक के समक्ष स्वतंत्र होकर रख सके. इस तरह छात्र की रूचि के अनुरूप पाठ्यक्रम निर्धारित किया जाए, न कि आनन-फानन में बुद्धिजीवियों के रूप में बैठे दो-चार व्यक्तियों द्वारा.
शिक्षा से होता है सामाजिक बुराइयों का अंत
 महात्मा गांधी कहते थे कि समाज में फैली प्रत्येक बुराई, कुरीतियों, प्रथाओं की जड़ का मूल कारण उत्तम शिक्षा का अभाव है. वह कहा करते थे कि यदि व्यक्ति ने जिस दिन उत्तम शिक्षा ग्रहण कर ली तो उस दिन समाज मे फैली समस्त विकृतियों का अंत निश्चित है.