Supreme Court On National Anthem : सिनेमाघरों में राष्ट्रगान का बजना देशभक्ति कम औपचारिकता ज्यादा

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Supreme Court On National Anthem : एंटरटेनमेंट के स्थानों में देशभक्ति को लाना जरूरी है क्या

Supreme Court On National Anthem : इन दिनों हमारे देश में देशभक्ति पर हर रोज कोई ना कोई नई बहस छिड़ी रहती है.

आज देश का हर नागरिक देशभक्ति की परिभाषा अपने अनुसार बनाने में लगा हुआ है, और मानक पूरे न करने पर दूसरे की देशभक्ति पर तुरंत ही सवाल उठा दिए जाते हैं
हाल ही में एक बार फिर देश में सिनेमाघरों में राष्ट्रगान अनिवार्य करने का फैसला गरमाने लगा है.
क्या है सिनेमाघरों में राष्ट्रगान अनिवार्य करने का मामला
आपको बता दें कि पिछले साल 30 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रगान, यानी ‘जन गण मन‘ से जुड़े एक अहम अंतरिम आदेश में कहा था कि देशभर के सभी सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने से पहले अनिवार्य रूप से राष्ट्रगान बजाया जाएगा. और इसके सम्मान में वहां मौजूद सभी लोगों को खड़ा भी होना होगा.
यहां तक कि देश भक्ति को महसूस करने के लिए वहां के सिनेमाहॉल के पर्दे पर राष्ट्रीय ध्वज भी दिखाया जाना जरूरी है.
लेकिन सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका की सुनवाई की दौरान अपने 30 नवंबर को दिए गए आदेश में एक प्रश्नचिन्ह लगा दिया है.
कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रगान राष्ट्रीय पहचान, राष्ट्रीय एकता और संवैधानिक देशभक्ति से जुड़ा मामला है. इसलिए हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी व्यावसायिक हित में राष्ट्रगान का इस्तेमाल नहीं किया जाए.
इसके अलावा कोर्ट ने कहा कि हमें यह सुनुश्चित करना होगा कि किसी भी तरह की मनोरंजन से जुड़ी गतिविधियां, ड्रामा क्रिएट करने के लिए भी राष्ट्रगान का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए.
तथा राष्ट्रगान को वैरायटी सॉन्ग के तौर पर भी नहीं गाया जाना चाहिए.
एंटरटेनमेंट के स्थानों में देशभक्ति को लाना जरूरी है क्या
दरअसल, श्याम नारायण चौकसे ने अपनी याचिका में कहा था कि किसी भी व्यावसायिक गतिविधि के लिए राष्ट्रगान के चलन पर रोक लगाई जानी चाहिए, और एंटरटेनमेंट शो में ड्रामा क्रिएट करने के लिए राष्ट्रगान को इस्तेमाल को पूर्ण रूप से प्रतिबंधित करना चाहिए.
उन्होंने याचिका में कहा कि एंटरटेनमेंट के स्थानो में इंसान तनावमुक्त होने के लिए जाता है, ऐसे में सिनेमाघर जैसे एंटरटेनमेंट स्थलों में राष्ट्रगान को अनिवार्य करना ये देश भक्ति को किसी को उपर जबरन थोपने जैसा है.
हालांकि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपनी तरफ से इस मामले को केंद्र सरकार के पाले में डाल दिया और उन्हें यह मामला अपने स्तर पर हल करने को कह दिया है.
कोर्ट ने इतना तक कहा कि न्यायालय देशभक्ति के प्रमाण-पत्र जारी नहीं कर सकता है. इसके लिए केंद्र सरकार को इस संबंध में कोई कानून बनाकर संसद में पास कराना होगा.
देशभक्ति की नाजायज बहस में पीछे छूट रहा विकास
सुप्रीम कोर्ट के इस नए आदेश के बाद से एक बार फिर राष्ट्रीय गान चर्चा का सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है.
लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि हम कब तक समझेंगे कि सिनेमाघरों में राष्ट्रगान को अनिवार्य करना देशभक्ति की भावना को बढ़ावा देना है या फिर देशभक्ति के नाम पर कट्टरता को बढ़ावा देना.
केंद्र सरकार हो या फिर सुप्रीम कोर्ट , हर कोई इस सवाल में उलझा पड़ा है.
ऐसे में देशभक्ति के गैरजरूरी मुद्दे के कारण एक बार फिर विकास का मुद्दा चर्चा से गायब हो गया है.
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