उत्तराखंड- बच्चों के हक की वकालत करने वाले खुद अपने हक के लिए तरस रहे

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जिस उत्तराखंड बाल आयोग के कंधों पर प्रदेश के भविष्य समझे जाने वाले बच्चों को न्याय दिलाने की जिम्मेदारी है, वह आयोग खुद न्याय के लिए तरस रहा है.
आपको यह जान कर हैरानी होगी कि आयोग के जिन सदस्यों का ओहदा शासन के प्रमुख सचिव के बराबर होता है, उन्हें मात्र 3 हजार रुपये महीने की तनख्वाह पर काम कराया जा रहा है. इस मामूली मानदेय के अलावा सदस्यों को वाहन, आवास जैसी कोई भी सुविधा उपलब्ध नहीं है.
आयोग के सदस्य लगातार लंबे समय से अपने हक के लिए लड़ रहे हैं. लेकिन सरकारी तंत्र में फैली जटिलता के कारण उन्हें आज तक उनके हक का सम्मान नहीं मिल पाया.

तीन माह से नहीं ले रहे वेतन

आयोग में अध्यक्ष व सचिव के अलावा छह मनोनीत सदस्य हैं. ये छह सदस्य अपनी उपेक्षा के चलते तीन माह से वेतन स्वीकार नहीं कर रहे हैं. इनका कहना है कि जब उनका पद प्रमुख सचिव के बराबर है और वह लोकसेवक के रूप में है. तो 3 हजार रुपये के मासिक मानदेय को स्वीकार करना उनके लिए स्वयं का अपमान जैसा है.
सदस्यों के पास पहचान-पत्र तक नहीं
आयोग की उपेक्षा की बानगी भर है कि जिन सदस्यों को प्रदेशभर के बाल अपराध व न्याय संबंधी मामलों का निपटारा करना होता है, उनके पास खुद का पहचान-पत्र तक नहीं है. सदस्यों ने बताया कि उनके साथ कई बार ऐसी भी स्थिति हो जाती है कि लोग उनसे पहचान-पत्र दिखाने के लिए कहते हैं. मगर पहचान पत्र ना होने के कारण उन्हें वहां शर्मिंदगी उठानी पड़ जाती है.
उत्तराखंड सरकार का आलम यह है कि आज तक राज्य में उत्तराखंड बाल अधिकार संरक्षण आयोग की नियमावली व ढांचा तक नहीं बनाया गया है.
आमदनी अठ्ठनी, खर्चा रुपया
आयोग के सदस्यों का मासिक तन्ख्वाह सिर्फ 3 हजार रुपये है. इसमें आयोग के सदस्यों को महीने में 10-14 दिन राज्य के विभिन्न जिलों में यात्रा करनी होती है. इसके लिए उन्हें न तो वाहन व आवास की सुविधा दी जाती है और न ही कोई यात्रा भत्ता.
ऐसे में बच्चों के इंसाफ के कारण सदस्य मजबूरन खुद के खर्चे पर दौरे कर रहे हैं. मगर दुर्भाग्यवश सरकार की नजरें उनकी दयनीय स्थिति को देखने तक को तैयार नहीं हैं.