कक्षा 8वीं के 56% बच्चें नहीं हल कर सकते बेसिक मैथ्स के सवाल – रिपोर्ट

ER Education Report 2018
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ASER Education Report 2018 : 8वीं कक्षा के 72.2% स्टूडेंट कक्षा 2 के स्तर की टेक्स्ट बुक पढ़ने में सक्षम हैं

ASER Education Report 2018 : देश में चल रहें सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था को लेकर आए दिन कोई ना कोई रिपोर्ट या फिर सर्वे आते रहते हैं.

देश के महान लोग इस पर चर्चा भी करते हैं लेकिन नतीजा आप सबके सामने ही है.
सरकार और हमारे इन महान लोगों को सच का एक और आइना दिखाती है बिल्कुल ताजा जारी हुई एनजीओ प्रथम की द एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (ASER).
इस रिपोर्ट के अनुसार सरकार द्वारा शुरू किए गए Right To Education भले ही अच्छा काम कर रहा हो इससे स्कूलों में बच्चों की पंजीकरण संख्या बढ़ी है.
लेकिन इससे देश के अंदर चले रहे तमाम माध्यमिक और प्राथमिक स्कूलों की शिक्षा स्तर में कोई सुधार देखने को नहीं मिला है.
ASER 2018 के मुताबिक सरकारी स्कूलों के 8वीं क्लास के 56% छात्रों को बेसिक गणित भी नहीं आती ,क्या कहती है ये रिपोर्ट विस्तार से जानिए…

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ASER Education Report 2018

प्राइमरी के सिर्फ 28% छात्र हल कर सकते हैं बेसिक गणित के सवाल

देशभर में कक्षा तीन के कुल 20.9 फीसदी छात्रों को जोड़ना-घटाना आता है.
साल 2008 में यह पाया गया था की कक्षा 5 के 37% छात्र गणित के बेसिक सवालों को हल कर सकते थे. लेकिन 2018 में ऐसे छात्रों का आंकड़ा घटकर 28% रह गया है.
जूनियर कक्षाओं मे सामान्य गणित का हाल
2018 में कक्षा 6 में 34.7%,कक्षा 7 में 39 फीसदी और कक्षा 8 में 43.9 फीसदी छात्र-छात्राएं भाग देना या मल्टीप्लाई करने जैसे छोटे-छोटे सवालों को ही सिर्फ हल करने में सक्षम है.
रीडिंग में पिछड़ रहे छात्र
साल 2008 में 8वीं कक्षा के 84.8% स्टूडेंट कक्षा 2 के स्तर की टेक्स्ट बुक पढ़ने में सक्षम थे.लेकिन साल 2018 में ऐसे छात्रों की संख्या घटकर 72.8% रह गई है.
यानी की कक्षा 8 के 27% छात्र दूसरी क्लास की भी किताब नहीं पढ़ सकते .
कंप्यूटर तो दूर की कौड़ी मानो
साल 2010 में 8.6 फीसदी स्कूल ऐसे थे, जहां बच्चे कम्प्यूटर का इस्तेमाल करते थे जो 2014 में घटकर 7.0 फीसदी पहुंच गई.
अब तो 2018 में ये 0.5 प्रतिशत और भी घट गई और 6.5 % पर पहुंच गई.
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गर्ल्स टॉयलेट का क्या हाल
इस मामले में हम कह सकते हैं देश में कुछ अच्छा काम हुआ है.
साल 2010 में जहां 32.9 फीसदी स्कूलों में छात्राओं के लिए अलग टॉयलेट की व्यवस्था थी. तो वहीं 2018 में 66.4 फीसदी स्कूलों में छात्राओं के लिए अलग टॉयलेट की व्यवस्था है.
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मिड डे मिल में भी हल्की बढ़ोत्तरी

साल 2010 में 84.6 फीसदी स्कूलों में बच्चों को मिड-डे-मील दिया जा रहा था. लेकिन अब ये बढ़कर 2018 में 87.1 हो गया है.
यानी की अब देश के सरकारी स्कूलों में 87.1 बच्चे मिड डे मिल योजना का लाभ उठा रहे हैं.
इस रिपोर्ट से ये तो साफ है की उभरती अर्थव्यवस्था के साथ शायद हमारे देश में सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था में उतनि प्रगति नहीं हुई है जितनी होनी चाहिए.
खैर महिला टॉयलेट,मिड डे मिल जैसे कुछ कदम दिखाते हैं की थोड़ा हुआ है लेकिन अभी बहुत बाकी है.
नोट : प्रथम एनजीओ ने रिपोर्ट तैयार करने के लिए 28 राज्यों के 596 जिलों से डेटा जुटाए हैं, जिसके लिए 3 से 16 साल के 5.5 लाख बच्चों से सवाल-जवाब किए गए.