एक महीने में 2 बार भारत बंद, आखिर किस दिशा में हो रहा भारत का विकास ?

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Casteism Based Bharat Bandh : 2 अप्रैल के बाद 10 अप्रैल को भी हुआ भारत बंद

Casteism Based Bharat Bandh : कभी एससी/एसटी एक्ट तो कभी आरक्षण के विरोध में भारत बंद का आहवाह्न करने वाले देश में कौन करेगा विकास की बात….

जी हां! ये प्रश्न आज के भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बन गया है और हो भी क्यो ना आखिर एक महीने में ही 2-2 बार भारत बंद करने वाले हमारे अपने ही नागरिक तो हैं जिनके कंधो पर देश की प्रगति पथ पर ले जानी की जिम्मेदारी है.
पीएम मोदी के नारे सबका साथ सबका विकास का अब तो लगता है जैसे धज्जियां उड़ाई जा रही हों क्योंकी हमारे यहां अब विकास के अलावा हर गैर जरूरी मुद्दे को लेकर बातें हो रही हैं.
2 अप्रैल के बाद 10 अप्रैल को भी भारत बंद
2 अप्रैल को एससी/एसटी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट के तरफ से किए गए परिवर्तन को लेकर अनुसूचित जाति और जनजाति समुदाय के लोग सड़कों पर उतर आए और पूरे देश में ताबड़-तोड़ हिंसात्मक गतिविधियां शुरू हो गईं.
मध्य प्रदेश के कई जिलों में कर्फ्यू लगाए गए बिहार में कई ट्रेनें रोकी गईं, और कई हिस्सों में सरकारी चीजों को आग के हवाले तक कर दिया गया. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस पूरी हिंसा में तकरीबन 14 लोगों की मौत भी हो गई.
यहीं नहीं इन सब के विरोध में फिर एक बार 10 अप्रैल के दिन आरक्षण के विरोध में भारत बंद बुलाया गया. इस बंद में वैसे लोग शामिल हुए जो दलित विरोधी और आरक्षण विरोधी थे. इनका मानना था कि आरक्षण के कारण योग्यता होने के बावजूद संवर्ग जाति के युवाओं को जॉब नहीं मिल पाता और वो दर-दर भटकने के लिए मजबूर हो जाते हैं.
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दोनों बंद में सिर्फ युवा हीं आए नजर
भारत युवाओं का देश है इस बात का दम हमारे देश के नेता लोग भी हर जगह भरते रहते हैं, लेकिन इसके बावजूद भारत में विकास नाम-मात्र का हो रहा है.
इसकी वजह साफ है और वो है युवाओं में बढ़ती हताशा और वो इसलिए है क्योंकि इनकी योग्यता का सही इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है.
अपनी पढ़ाई पूरी कर के हर युवा एक अच्छी जॉब चाहता है लेकिन सही विधि न होने के कारण उन्हें उस हिसाब से जॉब नहीं मिल पाता. इन युवाओं का कभी आरक्षण के नाम पर तो कभी पेपर लीक के नाम पर बस समय बितता रहता है ऐसे में ये हताश युवा विरोध करने पर उतारू हो जाते हैं.
यही वजह है कि इन युवाओं की भावनाओं का फायदा उठा कर कई नेता इन्हें बरगलाने में काफी हद तक कामयाब हो जाते हैं और इन्हें हर तरह की हिंसा में एक ढ़ाल के रूप में इस्तेमाल करते हैं.
जिसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2 अप्रैल को एससी/एसटी एक्ट के विरोध में भी सबसे ज्यादा युवा ही सामने आए और 10 अप्रैल के विरोध में भी उन्हीं की संख्या ज्यादा थी.
सोशल मीडिया पर हुआ 10 अप्रैल के बंद का आह्वाहन
सोशल मीडिया आज के समय में काफी तेजी से लोगों के दिन चर्या का साधन बन गया है. लेकिन अब मोबाइल और संचार की क्रांति के कुछ बुरे प्रभाव भी सामने आ रहे हैं.
10 अप्रैल के दिन विभिन्न राज्यों में उग्र प्रदर्शनों की गूंज सुनाई दी उसकी प्लानिंग सोशल मीडिया पर ही की गई थी.
दरअसल 2 अप्रैल को दलितों द्वारा भारत बंद करने के बाद किसी ने 10 अप्रैल को आरक्षण विरेधी बंद का आह्वाहन कर दिया जिसके चलते कल बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान व उत्तर प्रदेश सरीखे राज्यों में हिंसा और आगजनी हुई.
बिहार के आरा जिले में दो गुटों के बीच झड़प हो गई और देखते ही देखते ही मामला इतना बढ़ गया कि नौबत पत्थरबाजी और फायरिंग तक आ गई. वहीं मध्य प्रदेश के भिंड और मुरैना में पहले की हिंसा को देखते हुए कर्फ्यू पहले ही लगा दिया गया था. राजस्थान में बंद के चलते दुकानदारों ने दुकानें बंद रखीं.
हालांकि 10 अप्रैल को बुलाए गए भारत बंद का असर पूरे देश पर उतना नहीं पड़ा. इसका श्रेय हमें अपनी सरकारों और पुलिस प्रशासन को देना चाहिए जिन्होंने पहली की हिंसा से सीख लेते हुए इस बार अपना काम पूरी सर्तकता के साथ किया.
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भारत बंद को लेकर की गई राजनीति
2 अप्रैल के बंद के बाद जमकर राजनीति शुरू हो गई एक तरफ बीजेपी में दलित नेता अपने अधिकार को लेकर पार्टी में बगावत तक करने को उतारू हो गए हैं तो वहीं दूसरी तरफ कांग्रेसी उपवास कर दलितों का साथ देने में लगी है.
अब देखना है कि 10 अप्रैल को हुए बंद के बाद राजनीतिक पार्टियां क्या नया दांव खेलती हैं. फिलहाल अभी तक कोई भी नेता या राजनीतिक पार्टी इस बंद को लेकर कुछ भी नहीं कह रही है.
बहरहाल, ये तो जगजाहिर है कि हर चीज में अपना फायदा ढूढ़ना राजनीतिक पार्टियों और नेताओं के बांय हाथ का खेल है.