जानिए कौन हैं लिंगायत और वीरशैव, आखिर किस कारण सीएम सिद्दरमैया ने दिया इन्हें अलग धर्म का दर्जा

Karnataka Lingayat Community :
फोटो साभार - ट्वीटर

Karnataka Lingayat Community : कर्नाटक की राजनीति में इस समुदाए के लोगों का है खास प्रभाव 

Karnataka Lingayat Community : कर्नाटक विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान होने में हो सकता है काफी वक्त हो मगर राजनीतिक पार्टियों ने वोटरों को लुभाने के लिए अभी से ही अपने चुनावी दांव खेलना शुरू कर दिया है .

इसकी सबसे पहले शुरूआत खुद सत्ता में काबिज सिद्दरमैया सरकार ने करी है जिन्होंने चुनाव से पहले विशेष समुदाए के लोगों को फाएदा पहुंचाने के लिए बड़ा फैसला लिया है.
दरअसल कर्नाटक सरकार ने सोमवार को हुई अपनी कैबिनेट मीटिंग में लिंगायत और वीरशैव समुदाय को अलग धर्म की मान्यता देने का निर्णय किया है.
बता दें कि कर्नाटक की राजनीति में लिंगायत और वीरशैव समुदाए के लोगों का खास प्रभाव रहा है. यही वजह है कि मुख्यमंत्री सिद्दरमैया ने चुनाव से ठीक पहले इस मुद्दे को बेहतर ढंग से भुनाने की कोशिश करी है.
मंत्रिमंडल की बैठक के बाद पत्रकारों को संभोधित करते हुए राज्य के कानून मंत्री टीबी जयचंद्र ने कहा कि हमारी सरकार इस विषय में राज्य अल्पसंख्यक आयोग की सिफारिशों को मंजूर करते हुए लिंगायत और वीरशैव को अलग धर्म घोषित करने का फैसला करती है.
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उन्होंने बताया कि अब इस पर अंतिम मंजूरी लेने के लिए इन सिफारिशों को केंद्र के पास जल्द ही भेज दिया जाएगा.
हालांकि जयचंद्र ने यह भी कहा कि राज्य सरकार लिंगायत और वीरशैव को अलग धर्म का दर्जा देने में इस बात का पूरा ध्यान रखेगी कि इससे प्रदेश के अन्य अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर कोई असर ना पड़े.
कौन होते है लिंगायत और वीरशैव ?
लिंगायत एक स्वतंत्र धर्म है जिसकी स्थापना 12 वीं शताब्दी मे महात्मा बसवण्णां ने करी थी, पुरानी मान्यताओं के अनुसार बसवण्णां ने हिंदूओं में फैली जाति व्यवस्था की कुरीतियों के खिलाफ आंदोलन छेड़ा था. इसमें जो लोग इन महात्मा को और उनके आदर्शों को मानते हैं उन्हें लिंगायत कहा जाता है.
वहीं वीरशैव भगवान शिव की पूजा करते हैं. वीरशैवों के भी मंदिर, तीर्थस्थान आदि वैसे ही होते हैं जैसे अन्य संप्रदायों के, अंतर केवल उन देवी देवताओं में होता है जिनकी पूजा की जाती है.
जबकि लिंगायत शिव की पूजा नहीं करते बल्कि अपने शरीर पर इष्टलिंग धारण करते हैं जो एक गेंद की आकृति जैसी होती है.
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यहां से शुरू हुई इन पर राजनीति
आज से लगभग 40 साल पहले लिंगयातों ने जनता दल के नेता रामकृष्ण हेगड़े को अपना नेता माना हुआ था मगर जब 1999 में जनता दल का विघटन होने लगा तो इन लोगों ने कांग्रेस के नेता वीरेंद्र पाटिल को अपना समर्थन किया.
मगर किसी विवाद के चलते राजीव गांधी ने जब पाटिल को पद से हटा दिया तो इसके बाद लिंगायत समुदाय फिर से हेगड़े का समर्थन करने लगे.
हेगडे की मौत के बाद इन्होंने अपना भरोसा बीजेपी के पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा पर जताया मगर जब बीजेपी ने उन्हें सीएम पद से हटाया तो लिंगायत फिर नाराज हो गए और बीजेपी से मुंह मोड़ लिया क्योंकि येदियुरप्पा का लिंगायत समुदाय में अच्छा प्रभाव था.
हालांकि उन्हें हटाने के फैसले से पार्टी को 2013 मे हुए चुनाव में भारी हार से चुकाना पड़ा. येदियुरप्पा को वापस अपनी पार्टी में लाने का कारण बीजेपी के लिए इन समुदाए के वोट बैंक हासिल करना हो सकता है.
इसलिए इस बार के चुनावों से पहले ही दोनों राष्ट्रीय दल लिंगायत समुदाय को अपने पाले में करने की कोशिश करना चाहती है ताकि वो चुनाव में अपनी जीत पक्की कर सके.