वाराणसी में 478 सालों का टूटा रिकार्ड, महिलाओं ने किया अखाड़े में दंगल

फोटो साभार-डीएनए
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भारत की सांस्कृतिक छवि की पहचान को बनाने में अखाड़ो ने हमेशा से मुख्य भूमिका निभाई है . सदियों से इन अखाड़ो को पहलवानी या कुश्ती के प्रशिक्षण लेने की जगह माना जाता है. हालांकि मुख्य रूप से ये संस्थान केवल लड़कों और पुरुषों को प्रशिक्षण देने के लिए ही जाना जाता है. या यूं कहें कि इसकी पहचान केवल पुरूष खेल के रूप में ही होती है तो गलत नहीं है.
मगर वाराणसी के एक अखाड़े ने  महिलाओं को भी प्रशिक्षण देने के लिए अपने अखाड़े का द्वार खोल दिया है. जिसे महिलाओं के लिए पहलवानी की दुनिया में  प्रवेश का नया मार्ग माना जा रहा है.
वाराणसी के तुलसी घाट में स्वामिनाथ अखाड़ा ने महिला कुश्तीदारों से मिट्टी में कुश्ती के दांव लगवाकर सालों से चली आ रही उस गलतफहमी को दूर कर दिया. जिसमें कहा जाता था कि महिलाएं कुश्ती नहीं कर सकती. और ये फैसला अखाड़ा संगठन ने 2016 में आई आमिर खान की फिल्म दंगल को देखने के बाद लिया. जिसने संगठन के लोगों को 478 सालों से चली आ रही परंपरा को तोड़ने के लिए प्रभावित किया है.
नागपंचमी के दिन हुई इस प्रतियोगिता में उत्तर प्रदेश के पड़ोसी जिलों से करीब एक दर्जन लड़कियों ने भाग लिया था. जिसमें तीन राउंड मैचों के हुए इस आयोजन के अंत में संकटकामोचन फाउंडेशन द्वारा विजेताओं के रूप में चार लड़कियों को घोषित किया गया.
जहां पर इस प्रतियोगिता का आयोजन हुआ था. उस घाट को 16वीं सदी के महान हिंदू कवि तुलसीदास जी के नाम पर रखा गया है. वही तुलसीदास जिन्होंने महान भारतीय महाकाव्य रामचरितमानस की रचना की थी.
इस अखाडे को कई पहलवानों को अवार्ड दिलाने के लिए जाना जाता है,जिसमें से कल्लू पहलवान भी शामिल हैं.
दंगल फिल्म देखने के बाद कुश्ती में आने वाली विजेता पलक यादव कहती हैं कि “यह मेरे लिए बहुत अच्छा था, जहां मेरे दादाजी कल्लू पहलवान और उनके विद्यार्थियों ने कई वर्षों से अभ्यास किया था” मैंने वहीं से अपने कुश्ती के करियर  की शुरूआत की है.
लिंग भेदभाव को तोड़कर महिलाओं के लिए कुश्ती की शुरूआत करने का पूरा श्रेय डॉ विशंभर नाथ मिश्रा को जाता है. जो कि एक प्रोफेसर और वाराणसी संकटमोचन मंदिर के महंत भी हैं .
इस बारे में महंत के भाई और न्यूरोलॉजिस्ट डॉ विजया नाथ मिश्रा कहते हैं कि वाराणसी ऐसा स्थान हैं जहां रानी लक्ष्मीबाई का जन्म हुआ था, जिनकी छवि बहादुर और साहस महिला की थी. उन्होंने कहा कि हम महिला पहलवानों के लिए अखाड़ों को खोलकर उन्हें प्रोत्साहित करना चाहते हैं.
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