झारखंड़- तंगहाली की अवस्था में भी पशुओं की बेस्ट फ्रेंड हैं रोजीदा

कहते हैं भविष्य पर किसी का नियंत्रण नहीं होता है, ये स्वत: घट जाता है. लेकिन ये ऐसी कहानियां हैं जिनके चरित्र अपनी तकदीर खुद गढ़ते हैं. झारखंड के पाकुर जिले के महेशपुर ब्लाक के दमदमा गांव की रोजीदा से मिलकर यकीनन इंसानी जज्बे और हालात का सामना करने की इंसानी सामर्थ पर आपका भरोसा बढ़ जाएगा.
झारखंड के पाकुर जिले के मुरारई कस्बे के एक साथी के साथ जब मैं रोजीदा से मिलने उनके गांव पहुंचा तो घर के बरामदे से दिखने वाली जगह पर एक 19 वर्षीय लड़की कुछ छोटे बच्चों को ट्यूशन पढाती दिखी. ये रोजीदा हैं, हंसती खिलखिलाती और यकीनन विश्वास से भरी 19 वर्षीय पशुसखी रोजीदा अपने गांव में बदलाव की मुकम्मल चेहरा हैं.
बच्चों ने घर में कुछ मेहमानों को देखकर दीदी को नमस्ते कहा और मान लिया की छुट्टी हो गई. वैसे इस गांव में रोजीदा को बोलस वाली दीदी के नाम से भी जाना जाता है. बोलस पशुओं को दी जाने वाली सर्व रोग निवारक औषधि है. यह 36 जड़ी बूटियों से तैयार की जाती है. 5 रुपए प्रति बोलस के हिसाब से गांव के लोग रोजीदा से यह खरीदते हैं. रोजीदा महीने में 200 से 300 बोलस का व्यवसाय कर लेती हैं. यानी वे इसके जरिए 1000 से 1200 रुपए पा जाती हैं, वे इतने ही पैसे बतौर पशुसखी बकरियों के इलाज से भी पा जाती हैं. पूछने पर कि ये जानकारी कहां से मिली, रोजीदा बताती हैं कि टीजीटी और झारखंड राज्य आजीविका प्रमोशन सोसायटी से उज्जवल सरकार सर और रांची से सोनी जी के साथ कुछ पशुसखी दीदी लोग आईं थीं. जिन्होंने हमें इसके बारे में जानकारी दी.
रोजीदा अपनी मां के साथ अपने नाना नानी के घर रहती हैं. उनकी मां याद करती हैं कि जब रोजीदा एक साल की थीं तभी उनके पति और रोजीदा के पिता ने उन्हें तलाक दे दिया था और दूसरी शादी कर ली. और तबसे वे मेहनत मजदूरी करके अपने खर्चे चला रहीं थीं. बीता कल याद करके उनके आंखों में आंसू आ जाते हैं वे बताती हैं कि उन्हें बहुत ही विपरीत आर्थिक हालात का सामना करना पड़ा. बेटी के एक साल से 18 साल की यात्रा के दौरान बाप का आभाव, रोजमर्रा की आर्थिक कठिनाईयों से लेकर समाजिक प्रताड़ना तक का दंश उनके चेहरे पर साफ झलकता है. रोजीदा आज पूरे गांव की लाडली हैं, वे नवाचार का नया चेहरा हैं, गांव में डिवर्मिंग से लेकर वैक्सिनेसन के लिए लोग उनके पास सलाह लेने के लिए आते हैं.
बातचीत के क्रम में एक सुखद एहसास का पल तब आता हैं जब रोजीदा बताती हैं कि कुछ दिनों पहले उनके पिता उनके घर आए, रोजीदा से मिलने के लिए और कहा कि उन्हें रोजीदा पर गर्व है. रोजीदा आज आत्मनिर्भर हैं, और हर मिलने वाले को रोजीदा में एक सेंस ऑफ इंपावरमेंट का अहसास होता है. रोजीदा अब नए प्रयोगों की सर्व स्वीकार्य चेहरा बन चुकी हैं. पशुसखी बनने के बाद रोजीदा ने गांव के 800 बकरियों की डिवर्मिंग की है, वहीं 250 वैक्सीनेसन व 35 बधियाकरण भी रोजीदा ने की है. इसके अलावा रोजीदा ने 15 बकरी बीमा भी किया है.