Mathura Foreign Cowhelper: मथुरा में पिछले 39 साल से बिमार और बूढ़ी गायों की हमदर्द बन चुकी हैं जर्मन इरिना

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फोटो साभार- फेसबुक

Mathura Foreign Cowhelper: जर्मनी की रहने वाली हैं इरिना

Mathura Foreign Cowhelper: भारत में आजकल जिस तरह गौ रक्षा के नाम पर हो रही दरिंदगी के हालात हैं, उसमें यह कहना गलत नहीं होगा कि इससे हमारे देश की छवि को काफि नुकसान पहंच रहा.

तथाकथित गौरक्षक गाय माता की सेवा की बात तो करते हैं, लेकिन जब उन्हें ऐसा करने के लिए कहा जाता है तो उन्हें गाय के गोबर,मूत्र से घिन आने लगती है.
ऐसे ही लोगों की सोच पर सवाल उठा रही हैं एक ऐसी महिला जो देश की ना होकर भी देशवासियों और इन तथाकथित गौरक्षकों को गौ सेवा का सही मतलब बता रही हैं.
जर्मनी की रहने वाली महिला जिनका नाम फेडेराइक इरिना ब्रुनिंग हैं 1978 में भारत घूमने के लिए आई थीं.
दरअसल इरिना मथुरा के राधा कुंड में एक गुरू की तलाश में आई थी. जिसके साथ रहकर वो अपने जीवन में सुधार लाना चाहती थीं. लेकिन उन्हें यहां कोई गुरू तो नहीं मिला मगर उनकी जिंदगी में बदलाव लाने के लिए एक गाय जरूर मिल गई.
कहां से आया गौसेवा का विचार
Mathura Foreign Cowhelper: इरिना जब मथुरा में अपने गुरू की खोज में इधर उधर भटक रहीं थी तभी उनके एक पड़ोसी ने उन्हें गाय खरीदने के लिए कहा. जिसके बाद वो अपनी पड़ोसी की बात मानते हुए एक गाय खरीद ली.
उस गाय की देखभाल करते हुए धीरे धीरे इरिना का जुड़ाव इतना गहरा हो गया कि उन्होंने गाय से संबधित किताबें पढ़ना और हिंदी बोलना भी शुरू कर दिया.
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कुछ दिनों बाद इरिना की गायों के प्रति हमदर्दी इतनी बढ़ गई कि वो उन गायों के बारे में भी सोचने लगी जिन्हें काम का ना रहने या बूढ़ा होने पर यूं ही छोड़ दिया जाता है.
फिर एक दिन इरिना ने ऐसी ही गायों की रक्षा करने का प्रण लिया. इसके लिए उन्होंने सुरभि गौ सेवा निकेतन बनाया जिसकी वजह से वह सुदेवी माताजी के नाम से भी जानी जाती है.
गौसेवा में ही रम गई इरिना
Mathura Foreign Cowhelper: आज इरिना की गौशाला में 1200 गाय और बछड़े हैं. हालांकि जगह की कमीं होने के बावजूद भी वह असहाय गायों को अपने पास ही रखती हैं.
इस गौशाला की खास बात यह है कि यहां बिमार गाय, अंधी या बुरी तरह से जख्मी हुई गाय को अलग अलग चैंबरों में रखा जाता है. जहां उनकी पर्याप्त देखभाल होती है.
वर्तमान में इरिना के गौशाला में 60 लोग काम करते हैं जो सभी गायों के ख्याल रखने में उनकी मदद करते हैं.
इरिना बताती हैं कि वो हर महीने इन गायओं की खुराक,उनके दवा-पानी और देखभाल करने वाले कर्मचारियों पर 22 लाख रुपए खर्च होते हैं. जिसका इंतजाम करने के लिए उन्हें बहुत मशक्कत करना पड़ता है.
उन्होंने बताया कि बर्लिन में अपनी जमीन से आने वाले किराए से वह यह सब खर्चा उठाती है.
वीजा संबंधित परेशानी झेल रहीं इरिना
Mathura Foreign Cowhelper: इरिना की सबसे बड़ी मुश्किल है उनका वीजा. अब तक भारत सरकार ने उन्हें ना तो भारत की नागरिकता दी है ना ही लंबे समय का वीजा.
इन सब मुश्किलों के बावजूद वह किसी तरह सब संभाल रही हैं. इसके साथ ही साथ बिमार पिता को देखने के लिए भी उन्हें हर साल बर्लिन जाना पड़ता है.
हमें इरिना से सीखना चाहिए जो हमारे देश में रहकर हमें ही हमारे संस्कार निभाने का तरीका बता रहीं है.