18 साल के युवकों से ज्यादा फिट हैं 87 साल की यह महिला एथलीट

Woman Athlete Daisy Victor
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Woman Athlete Daisy Victor : डेजी बतौर एथलीट अब तक देश के लिए 414 मेडल जीत चुकी हैं.

Woman Athlete Daisy Victor : देश के लिए मेडल जीतना किस इंसान की चाह नहीं होती जिनके अंदर ऐसा सामर्थ रहता है वो अपने इस सपने को पूरा करते हैं और जो नहीं कर सकते वो दूसरे की जीत से खुश हो लेते हैं

बीते कुछ सालों में भारतीय एथलिटो ने अपने पराक्रम से दुनिया भर मे लोहा मनवाया है इन्ही में एक खास नाम है 87 साल की महिला एथलीट डेजी विक्टर का.

बता दें कि डेजी बतौर एथलीट अब तक देश के लिए 414 मेडल  जीत चुकी हैं.

हाल ही में खत्म हुए वर्ल्ड मास्टर्स एथलेटिक्स चैंपियनशिप में उन्होंने फिर एक बार देश के लिए शॉटपुट और डिस्क्स थ्रो में ब्रॉन्ज मेडल हासिल कर हम सबका मान बढ़ाया है.
डेजी अब तक 20 अंतरराष्ट्रीय, 36 नेशनल और 59 जिला स्तर के खेलों में भाग ले चकी हैं जिसमें उन्होंने 345 गोल्ड मेडल हासिल किए हैं.
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कौन है डेजी विक्टर
तिरुनेलवेली में जन्म लेने वाली डेजी का शुरूआती जीवन बेल्लारी में बीता क्योंकी उनके पिता एक पोस्टमास्टर थे और वहीं कार्यरत थे.
डेजी का बचपन से ही खेल के प्रति खास लगाव था उन्होंने आठ साल की उम्र से ही स्कूलों के स्पोर्टस फंक्शन में दौड़ प्रतियोगिता में भागना शुरू कर दिया था.
अंग्रेजी अखबार द हिंदू को दिए इंटरव्यूह में डेजी बताती हैं कि उनका ट्रैक और फील्ड इवेंट्स में प्रदर्शन काफी अच्छा रहता था.उन्होंने स्कूल में ट्रैक और फील्ड इवेंट्स में अच्छा प्रदर्शन किया.
स्कूली शिक्षा हासिल करने के बाद 1951 में उन्हें मद्रास टेलीफ़ोन में सरकारी नौकरी मिल गई जहां एक एथलीट होने के नाते उन्हें हर दिन अन्य एथलिटों को दो घंटे ट्रेन करने के लिए विशेष अनुमति दी गई.
यहां उन्होंने संगठन का प्रतिनिधित्व करते हुए अपने और टीम को कई पदक दिलाए.
इस दौरान साल 1956 में उनकी शादी विक्टर सुंदराजन से हो गई और दोनों के 10 साल में 6 बच्चे पैदा हुए.
लेकिन इसके बावजूद उन्होंने अपनी दौड़ से ब्रेक नहीं लिया जिसमें उनके पति ने पूरा साथ दिया.
प्रेगनेंसी के शुरुआत के तीन महीने वो दौड़ती फिर आराम करती और डिलीवरी के अगले महीने से ट्रैक पर वापस दौड़ना शुरू कर देती.

Woman Athlete Daisy Victor :

मिल्खा सिंह ने किया प्रेरित
जब 1980 में मिल्खा सिंह चेन्नई आए, तो उन्होंने वहां अनुभवी एथलीट एसोसिएशन का गठन किया. यहां उन्होंने डेजी को विश्व अनुभवी एथलेटिक मीटिंग में भाग लेने के लिए प्रेरित किया जिसका नतीजा रहा कि 1981 में वह न्यूजीलैंड गईं और 7 वां रैंक हासिल करी.
डेजी बताती हैं कि ये वो समय था जब उन्होंने विक्टर विल्सन के अंडर में अंतराष्ट्रीय ट्रैक पर दौड़ने के लिए कोचिंग लेनी शुरू कर दी थी.
आज भी डेज़ी दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में 7.30 बजे से 9.30 बजे तक अभ्यास करती है.
इसी का नतीजा है कि दो हफ्ते पहले स्पेन में मास्टर्स मीट में ब्रॉन्ज मेडल जीता और 30 सितंबर को जिला स्तर के स्वामी की बैठक में तीन गोल्ड मेडल जीते.
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परिवार को भी खेल के प्रति करती हैं जागरूक

हर सुबह वह एक फ्लास्क में नाश्ता और कॉफी पैक करके ट्रैक पर अभ्यास करने के लिए घर से निकल जाती हैं और फिर 11 बजे ही वापस लौटती हैं.

ट्रिपल जंप और लॉन्ग जंप उनकी पसंदीदा इवेंट थी लेकिन अपने पति के निधन के बाद उन्होंने वह छोड़ दिया अब वह सिर्फ डिस्कस थ्रो शॉटपुट पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं.
जेडी कभी बिमार नहीं पड़ी, वह हमेशा फिट रहती है जो हम सबके लिए एक बड़ा उदाहरण हैं. वो अपने परिवार में भी उन्होंने खेल के प्रति लोगों को जागरुग रखा है और बाकी लोगों भी ऐसा करने की सलाह देती हैं.