कन्नड़ स्कूल को बचाने के लिए मां बेटी तय करती हैं रोजाना 60 किलोमीटर की दूरी

Ballia Rampur Yuva Pratibha Khoj Pariksha
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Women Save Kannada School : कम बच्चे होने के कारण स्कूल बंद होने के कगार पर

Women Save Kannada School : कर्नाटक की एक महिला मजदूर ने अनपढ़ होने के बावजूद शिक्षा के महत्व को बखूबी समझते हुए पूरे देश के लिए एक मिसाल कायम की है.

यह कहानी है एक ऐसी अनपढ़ मजदूर मां की जो अपने बेटी के साथ साथ पूरे गांव के बाकि बच्चों की जिंदगी में भी शिक्षा की रोशनी भरने के लिए तमाम मुश्किलों का सामना कर रही है.
दरअसल अक्टूबर में कन्नड़-माध्यमिक विद्यालय में कक्षा 2 में पढ़ने वाली छात्रा निशमिथा के माता पिता ने स्कूल से काफी दूर पर खुद का एक घर बना लिया और वहीं जाकर रहने लगे.
मगर निशमिथा की मां लक्ष्मी को अक्सर यह चिंता सताती रहती की कहीं उसकी बच्ची के स्कूल छोड़ने के बाद विद्यालय बंद ना हो जाए. क्योंकि जिस स्कूल में उनकी बेटी पढ़ती थी वहां उसे मिलाकर सिर्फ 4 स्टूडेन्टस ही थे.
ऐसे में उनकी बेटी के स्कूल छोड़ने के बाद यह संख्या 3 हो गई थी और जिसके बाद वो स्कूल हमेशा के लिए बंद होने के कगार पर आ खड़ा हुआ था.
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लेकिन इस अनपढ़ और पेशे से मजदूर महिला ने बाकि बच्चों के लिए भी शिक्षा की महत्वता को समझते हुए रोजाना अपनी बेटी के साथ 60 किलोमीटर का सफर तय कर उसे स्कूल ले जाने का फैसला किया.
बता दें कि निशमिथा को रोजाना स्कूल पहुंचने के लिए अपनी मां के साथ लगभग 1 घंटे तक पैदल चलने के बाद कल्पपड़ी जहां पर स्कूल स्थित हैं वहां तक पहुंचने के लिए रास्ते में दो बार बस बदलनी पड़ती है.
गौरतलब है कि लक्ष्मी अपनी बेटी के स्कूल के पास ही काम करती हैं और जब वह वहां जाती है तो अपनी बेटी को स्कूल में छोड़ते हुए अपने काम पर चली जाती हैं और फिर शाम को वापस आते समय वो निशमिथा को ले आती हैं.
लक्ष्मी के मुताबिक उन्हें बस के किराए के रूप में रोजाना 70 रुपए देने पड़ते हैं मगर इसके बावजूद वो हर रोज अपनी बेटी के साथ समय पर स्कूल जाती हैं. यहीं नहीं इस स्कूल में पढ़ाने वाली शिक्षिका भी 35 किलोमीटर दूर से 6 बसों को बदलकर इन बच्चों को पढ़ाने के लिए आतीं है.
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ग्रामीणों के मुताबिक ये स्कूल तकरीबन 50 साल  पुराना है और एक समय में आसपास के इलाकों का एकमात्र शिक्षण संस्थान भी था. लेकिन समय के साथ अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की बढ़ती संख्या की वजह से आज इस स्कूल के बंद होने की नौबत आ गई हैं.
हालांकि कई अवसरों पर, स्कूल के शिक्षक आस पास के घरों में जाकर गांववालों से अनुरोध किया कि वे अपने बच्चों को इस स्कूल में बेजं ताकि वह बंद ना हो लेकिन अब तक इसका कोई फायदा नहीं हुआ है.

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