ग्लोबल वार्मिंग पर हैरान करती रिपोर्ट, दुनिया भर में गहरा सकता है काल

Global Warming Arctic Sea Study

Global Warming Arctic Sea Study : रिसर्च के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग के कारण दुनिया के दूसरे बड़े बर्फीले रेगिस्तान का क्षेत्रफल 10 फीसद अधिक बढ़ गया है.

 Global Warming Arctic Sea Study : ग्लोबल वार्मिंग दुनियाभर में गहराती जा रही एक ऐसी गंभीर समस्या है, जो दिन ब दिन अपना विकराल रुप धारण करती जा रही है.

हालांकि इसे रोकने के लिए हर देश अपनी तरफ से कई पुरजोर प्रयास कर रहा है लेकिन इसके बावजूद भी ग्लोबल वार्मिंग के बर्फ की बिछी चादरें बाढ़ की तरह बहती चली जा रही हैं.
हाल ही में एक रिसर्च के अनुसार दुनिया के सबसे बड़े बर्फीले रेगिस्तान अंटार्कटिका और दूसरे बड़े रेगिस्तान आर्कटिक के पिघलने से क्षेत्रफल में दस फीसदी वृद्धि देखी गई है जो दुनिया के लिए बेहद खतरनाक है.
आपको बता दें कि यह रिसर्च अमेरिका के मैरीलैंड यूनीवर्सिटी में की गई, इस रिसर्च में पिछले 100 सालों के आंकड़ों को लिया गया है जिसके अनुसार रेगिस्तानों के क्षेत्रफल में 9 लाख की वृद्धि मापी गई है.
रिसर्च के ये आंकड़े इतने डराने वाले हैं कि अगर ग्लोबल वार्मिंग को समय रहते नहीं रोका गया तो आर्कटिक की बर्फ कुछ वर्षों में गायब हो जाएगी.
गौरतलब है कि 197 देशों का पेरिस जलवायु समझौता विश्व को 19वीं शताब्दी से ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस पर वृद्धि करने के लिए प्रयासरत है, लेकिन अब तक एक डिग्री के साथ वार्मिंग के कारण से धरती सूखे, गर्मी की लहरों, और बढ़ते समुद्रों से बढ़ने वाले तूफानों की मार झेल रही है.
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वहीं 2017 में, गर्मियों में समुद्र का बर्फ सितंबर में घटकर 4.64 मिलियन वर्ग किलोमीटर (1.79 मिलियन वर्ग मील) हो गया है.
आपको बता दें कि यह आंकड़ा 2012 में 3.39 मिलियन वर्ग किलोमीटर के रिकार्ड से ऊपर था, लेकिन पिछले 4 दशकों में न्यूनतम समुद्र की बर्फ की मात्रा लगभग 40% कम हो गई है.
यही कारण है कि शोधकर्ता आर्कटिक महासागर के लिए गर्मियों में बर्फ मुक्त होने का चिंताजनक अनुमान लगा रहे हैं.
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) की पिछले हफ्ते रिपोर्ट की बात करें तो CO2 के उत्सर्जन में कटौती करने के लिए पेरिस समझौता और इसके तहत की गईं स्वैच्छिक राष्ट्रीय प्रतिज्ञाएं, यदि पूरी हो जाती हैं तो सबसे इस स्तिथि में 3 डिग्री सेल्सियस से दुनिया का उत्पादन होगा.
इससे आर्कटिक को बदलना पड़ेगा, जो कि अब तक पूरी तरह से विश्व की दर से दोगुनी हो गई है.
विशेषज्ञों के अनुसार विकासशील ग्लोबल वार्मिंग का यह डराने वाला रुप सभी देशों के लिए खतरनाक होता जा रहा है.
हालांकि इसे रोकने के संबंध में कई तरह के विचार किए जा रहे हैं लेकिन ये कितने मददगार और कितने नुकसान पहुंचाने वाले साबित होंगे अभी कुछ नहीं कहा जा सकता.
एक लीक रिपोर्ट में यूएन ने भी आशंका जताई है कि ग्लोबल वार्मिंग काफी नुकसान पहुंचा सकता है. इससे मौसम के पैटर्न में बदलाव आ सकता है जिसे एक बार शुरू होने के बाद रोकना मुश्किल हो सकता है.