गूगल ने डूडल बनाकर दादासाहब फालके की 148वीं जयंती पर किया याद

DadaSaheb Falke Google Doodle

DadaSaheb Falke Google Doodle : भारतीय सिनेमा के पितामह कहे जाते हैं दादासाहब फालके.

DadaSaheb Falke Google Doodle : गूगल ने भारतीय सिनेमा के पितामह धुंदीराज फालके उर्फ दादासाहब फालके की 148वीं जयंती के उपलक्ष में डूडल बनाकर उन्हें याद किया.

गौरतलब है कि दादा साहेब 19 वें दशक के भारतीय सिनेमा के बेहतरीन अभिनेता ही नहीं बल्कि सफल फिल्म निर्माता भी रहे.
दादा साहब ने कई बेहतरीन फिल्में बनाई और साथ ही फिल्मों में अभिनय करके अपने दर्शकों के दिल पर अपनी छाप भी छोड़ी है.
बता दें कि दादा साहब की बनाई गई पहली फिल्म राजा रहिश्चंन्द्र थी, जो कि एक मूक फिल्म थी.
दादा साहब इस फिल्म के न केवल डायरेक्टर ही थे, बल्कि उन्होंने ही इस फिल्म की कहानी को लिखा था, साथ ही कैमरामैन से लेकर वीडियोग्राफी तक सभी तरहा का काम उन्होंने इस फिल्म के लिए किया.
दादा साहब ने 19 साल की उम्र से फिल्में करना शुरु कर दिया था. जिसके बाद अंतिम सांस तक उन्होंने अपने जीवन की 95 लंबे समय की फीचर फिल्म से लेकर 27 सार्ट फिल्में कर अपना नाम सफलता के पन्नों में दर्ज कराया.
उनकी कुछ बहुत ही लोकप्रिय होने वाली फिल्में मोहिनी, भस्मासुर, लंका दहन और कालिया मर्दन थीं.
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भारतीय सिनेमा में नाम से ही पहचाने जाने वाले और सिनेमा का पिता कहे जाने वाले दादा साहब का भारतीय सिनेमा को ऊचाईयों तक पहुंचाने में बहुत बड़ा योगदान रहा है.
बता दें कि उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी भारतीय सिनेमा के नाम कर दी थी. इसी महानतम योगदान के चलते भारत सरकार ने उनको सम्मानित करते हुए 1969 में उनके नाम से सिनेमा को एक अवार्ड समर्पित किया.
इस अवार्ड का नाम दादा साहब फाल्के के नाम पर ही रखा गया. ये अवार्ड फिल्म व्यक्तित्वों के लिए सबसे बड़ा माना जाता है. यही नहीं भारत सरकार ने दादा साहब को श्रद्धांजलि देने के लिए उनके नाम पर एक डाक टिकट भी जारी किया था.
इसके अलावा, दादासाहेब फाल्के फिल्म फाउंडेशन नाम की एक नींव भी है जो प्रतिष्ठित फिल्म निर्माता के नाम पर पुरस्कारों के साथ फिल्मों में सर्वश्रेष्ठ प्रदान करती है.
दादा साहब का असली नाम धुंदीराज गोविंद फालके था, उनका जन्म 30 अप्रैल 1870 में मराठी ब्राह्मण परिवार में महाराष्ट्र के त्रयंबकेश्वर में हुआ था.
दादा साहेब फिल्ममेकर बनने से पहले फोटोग्राफी का काम किया करते थे. यही नहीं उन्होंने एक समय पर अपनी खुद की प्रिंटिंग प्रेस भी चलाई थी.
और आखिर में 16 फरवरी 1944 को दादासाहब फिल्म जगत और अपने चाहने वालों को हमेशा के लिए यादों के सहारे छोड़कर चले गए थे.

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