मुस्लिमों की नजर में क्या है शरिया कानून और क्यों इसे लेकर एक बार फिर उठा विवाद

Muslim Sharia Law
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Muslim Sharia Law : कई साल पहले उठी थी शरिया अदलातों को बंद करने की मांग

Muslim Sharia Law : पिछले कुछ दिनों से भारत के कुछ मुस्लिम धर्मगुरुओं की जुबान से एक शब्द “शरिया कानून” सुनने में आ रहा है. आखिर इस शब्द का मतलब क्या है और क्यों इसे लेकर देशभर में विवाद खड़ा हो गया है ? 

आज हम आपको इन सभी सवालों का जवाब देंगे लेकिन इनके जवाब देने से पहले  आपको यह जानना जरूरी है कि आखिर शरिया कानून आया कहां से ? 
 शरिया कानून का इतिहास !
दरअसल मुस्लिम धर्म के अनुसार जब तक मोहम्मद पैगंबर साहब जिंदा थे तब-तक सभी समस्याओं का समाधान कुरान के हिसाब से किया जाता था, जिसे मुस्लिम देशों और उनके शासकों ने अपनाना शुरू कर दिया.
हालांकि, समय के साथ इन में कुछ बदलाव भी आया लेकिन अधिकांश कानून आज भी वैसे के वैसे ही हैं जैसे पैगंबर मोहम्मद साब के टाइम पर हुआ करते थे.
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भारत में शरिया कानून यानी कि इन तरीकों का प्रचार-प्रसार करने के लिए “ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल बोर्ड” का गठन किया गया जिसके तहत उनकी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी यही थी कि मुस्लिमों के कानून को सुरक्षित रखा जा सके.
ज्ञात हो भारत में साल 1937 में यह कमेटी अंग्रेज़ों द्वारा गठित की गई थी.
क्यों विवादों में है शरिया कानून ! 
शरिया कानून के तहत आम तौर पर तलाक, शादी या जमीनी विवाद आदि छोटे-मोटे मुद्दों पर फैसले सुनाए जाते थे और जाते रहे हैं.
आज उत्तर प्रदेश में करीब 40 ऐसी अदालतें हैं जो शरिया कानून के तहत चलाई जाती हैं और अब ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने मांग उठाई है कि हर जिले में कम से कम एक ऐसी अदालत हो जो शरिया कानून के तहत चले. 

कई साल पहले उठी थी शरिया अदलातों को बंद करने की मांग ! 

आपको बता दें इन अदालतों को दारुल कजा नाम से जाना जाता है और इनको लेकर साल 2005 में एक याचिका भी दायर की गई थी जिसके तहत इन्हें बंद कराने की मांग उठी थी.
लेकिन कोर्ट ने साल 2014 में फैसला सुनाया कि इनको बंद नहीं किया जा सकता है. हालांकि, दारुल कजा की कानूनी तौर पर कोई मान्यता नहीं है.
यह व्यक्ति का पर्सनल मामला है कि वह कोर्ट में आता है या फिर दारुल कजा में जाकर अपना मामला सुलझा आता है.
15 जुलाई को है आल इंडिया मुस्लिम  पर्सनल लॉ बोर्ड की मीटिंग 
अब बोर्ड के मेंबर ज़फरयाब जिलानी का कहना है कि उन्हें पूरे देश में दारुल कजा बनानी हैं ताकि मुसलमानों को उनके धर्म के अनुसार न्याय मिल सके.
उन्होंने कहा है कि यदि हम शरिया के अनुसार न्याय देंगे तो दोनों ही पक्ष उसमें संतुष्ट रहेंगे.
आपको बता दें शरिया कानून के तहत बनाए गए तीन तलाक को सुप्रीम कोर्ट ने भी असवैंधानिक करार दिया है. ज्ञात हो तीन तलाक के तहत मुस्लिम मर्द अपनी बीवियों को मात्र तीन बार तलाक होने के बाद छोड़ सकते हैं.
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आने वाली 15 जुलाई को ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की एक मीटिंग है जिसमें फैसला लिया जाएगा कि आखिर इन अदालतों  को कैसे स्थापित किया जाए .
इस मीटिंग में इस बात पर भी चर्चा की जाए कि इन अदालतों को चलाने के लिए  खर्च कहाँ से आएगा क्योंकि एक दारुल कजा को चलाने में करीब ₹50000 महीने का खर्च है.
फिलहाल देशभर में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की इस दलील का कड़ा विरोध हो रहा है और इसे देश को बांटने की साजिश बताई जा रही है.
आपको बता दें मामला इतना बढ़ चुका है कि एक मौलवी ने ये तक कह दिया “या तो शरिया अदालतें दो या फिर अलग देश दे दो”
गौरतलब है कि इस मुद्दे के ऊपर उठने के बाद एक बार फिर भारत हिंदू और मुस्लिम की राजनीति में पिस्ता दिख रहा है.
यही वक्त है जनता को एक होने का और ऐसी राजनीतिक रोटियां सेकने वालों को उनकी औकात याद दिलाने का.
यदि वक्त पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया तो वह दिन दूर नहीं है जब एक या दो नहीं बल्कि कई छोटे-छोटे मुल्क में भारत का विभाजन हो जाएगा.