बांग्लादेश के तर्ज पर क्या कभी सुलझ पाएगा भारत में आरक्षण का मसला !

Reservation Issue In India
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Reservation Issue In India : भारत में आरक्षण के मसले को सुलझाने की करनी चाहिए कोशिश

Reservation Issue In India : आरक्षण का मसला सिर्फ भारत ही नहीं अपितु विश्व के अन्य कई देशों के लिए भी हमेशा से चुनौती का विषय रहा है, जिससे सभी देश समय समय पर अपने ढ़ंग से निपटने की कोशिश करते रहते हैं.

अभी हाल ही में बुधवार यानि कि 11 अप्रैल को हमारे पड़ोसी देश बांग्लादेश ने सरकारी नौकरियों में से आरक्षण को पूर्ण रूप से खत्म करने का ऐलान किया है.
अब सोचने वाली बात यह है कि जब सभी देश आरक्षण जैसे मुद्दे को सुलझाने का प्रयास कर रहे हैं तो ऐसे में हमारा देश क्यों बैकफुट पर रहना चाहता है.
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बांग्लादेश में छात्र लंबे समय से कर रहे थे विरोध
बांग्लादेश के छात्रों के लिए 11 अप्रैल का दिन एक बड़ी जीत के साथ सामने आया, आरक्षण के मसले पर कई दिनों से विरोध कर रहे इन छात्रों के सामने आखिर प्रधानमंत्री शेख हसीना को झुकना ही पड़ा.
मीडिया रिपोर्टस के अनुसार पीएम शेख हसीना ने संसद में एक बयान जारी करते हुए कहा कि अब से सरकारी नौकरियों से आरक्षण को समाप्त कर दिया जाएगा क्योंकि अगर ऐसा नहीं किया गया तो भविष्य में बदलाव को लेकर फिर उपद्रव किये जायेंगे, इसीलिए इसे खत्म करना ही एक बेहतर उपाय है.
गौरतलब है कि बांग्‍लादेश में आरक्षण में बदलाव को लेकर हजारों छात्रों ने रविवार को भारी प्रदर्शन शुरू किया था जिसमें 100 से अधिक छात्र घायल हो गए थे.
बांग्लादेश में अभी क्या है आरक्षण का नियम
वर्तमान में बांग्लादेश में आरक्षण का बड़ा ही गजब का नियम है, दरअसल साल 1972 में बांग्लादेश में कोटा सिस्टम लाया गया था जिसके तहत बांगलादेश के अंदर सिर्फ 44 प्रतिशत लोगों को ही योग्यता पर सरकारी नौकरी मिलती है जबकि 56 प्रतिशत विभिन्न कोटे वालों के लिए आरक्षित रख दी जाती है.
आपको बता दें कि इस 56 प्रतिशत में 30 प्रतिशत स्वतंत्रता सेनानियों के बच्चों और नाती-पोतियों, 10 प्रतिशत महिलाओं के लिए , पिछड़े जिलों के लोगों के लिए 10 प्रतिशत, स्वदेशी समुदायों के सदस्यों के लिए 5 प्रतिशत और शारीरिक रूप से विकलांग लोगों के लिए 1 प्रतिशत रखा गया है.
हालांकी अब आरक्षण खत्म करने के सरकार के वादे के बाद इस नियम में पूरी तरह से बदलाव किए जाने हैं.
भारत में आरक्षण की हालत और भी है बत्तर
हमारे देश में तो आरक्षण की हालत और भी ज्यादा खराब है आरक्षण को लेकर आए दिन हमारे यहां विरोध प्रदर्शन होते रहते हैं. जिसमें कुछ इसके खिलाफ रहते हैं तो कुछ अपनी जाति को भी आरक्षण में शामिल करने की मांग करते हैं.
हमारे संविधान में पिछड़ी जाती को आरक्षण इसलिए दिया गया था, ताकि उन्हें समाज में बराबरी का अधिकार दिया जा सके लेकिन अब एक लंबा अरसा बीत जाने के बाद इन अधिकारों का कई जगहों पर दुरूप्रयोग हो रहा है.
टैलेंट होने के बावजुद सीट की कमी के कारण सामान्य जाति के छात्रों को सरकारी नौकरियां, अच्छे स्कूल कॉलेजों में प्रवेश से वंचित होना पड़ जाता है.
लेकिन यहां हम इस बात को भी नहीं झूटला सकते की आज भी ग्राउंड रियालिटी देंखें तो निचली जाती के साथ भेद-भाव किया जाता है ,कई जगह पर उन्हें नीच समझा जाता है.
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आरक्षण के मसले को सुलझाने की करनी चाहिए कोशिश
अगर सोचा जाए तो आरक्षण का मुद्दा उतना बड़ा नहीं है जितना की हमारे देश में इसे बना दिया गया है. अगर राजनीतिक पार्टी इसे अपने वोट बैंक के लिए इस्तेमाल करना छोड़ दें तो इसे सुलझाने में जरा सी भी देरी नहीं लगेगी.
उल्लेखनीय है कि संविधान में जातिय आरक्षण के अलावा इसे इकॉनामिकली रखने की बात भी कही गई है जिसे ना के बराबर इस्तेमाल में लाया जाता है.
आज के युवाओं के अंदर सबसे ज्यादा गुस्सा इस बात को लेकर है कि कैसे सरकारी नौकरियों में बड़े-बड़े पदों पर अधिक मार्क्स लाने के बाद भी सामान्य श्रेणी के छात्रों का चयन नहीं हो पाता है. जबकि वहीं कम अंक लाने वाले  आरक्षित श्रेणी के छात्र बड़े-बड़े पदों पर आसीन हो जाते हैं.
हालांकी इन युवाओं का ज्यादातर वर्ग आरक्षण के खिलाफ नहीं है बस उनकी इतनी मांग है कि अब समय आ गया है कि आरक्षण को किसी जाति को ना देकर उन लोगों को दिया जाए जो वाकई गरीब हैं और जिन्हें सच में इसकी जरूरत है.
यहां यह कहना बिल्कुल भी गलत नहीं होगा कि ये हमारे देश का ही दुर्भाग्य है कि यहां योग्यतापूर्ण युवाओं के होते हुए भी हम अभी तक विकासशील देश ही बने हुए हैं, और ऐसा होने की बड़ी वजह कहीं ना कहीं मौजूदा आरक्षण में व्याप्त विसंगतियां है जिसे दूर करने के लिए सरकार को शीघ्र ही कदम उठाना चाहिए.