नेताजी सुभाष चंद्र बोस के सम्मान में पीएम मोदी ने साल में दो बार फहराया तिरंगा

Pm Modi On Azad Hind Fauj Anniversary
PC - ANI

Pm Modi On Azad Hind Fauj Anniversary : आजाद हिंद फौज के गठन की आज 75वीं सालगिरह है

Pm Modi On Azad Hind Fauj Anniversary : गुलाम भारत को शस्त्र और बल के जरिए आजाद कराने की कोशिश करने वाले सुभाष चंद्र बोस देश के महान क्रातिंकारी नेताओं में से एक थे.

अंग्रजों से आजादी दिलाने को लेकर उनके किए गए संघर्षों को आज भी कोई देशवासी नहीं भूल सकता.
बोस भले ही अब हमारे बीच ना रहे लेकिन अंग्रेजों को देश से बाहर फेंकने के लिए बनाई गई उनकी आजाद हिंद फौज की कोशिश और उसके जवानों के जज्बों को हम सदैव सलाम करते हैं.
21 अक्टूबर को गठित हुए हिंद आजाद फौज का आज 75 वां स्थापना दिवस है, इस मौके पर देशभर में कई कार्यक्रम आयोजित किया गया.

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इस फौज और सुभाष जी को असली सम्मान देने के लिए खुद पीएम मोदी ने लाल किले पर तिरंगा फहराकर उनकी वीरगाथा को याद किया.
बता दें कि यह पहला मौका था जब देश का प्रधानमंत्री 15 अगस्त के अलावा किसी अन्य मौके पर लाल किले पर तिरंगा फहराया है.
ध्वजारोहण के बाद देश को संबोधित करते हुए पीएम ने कहा कि ’75 साल पहले देश से बाहर बनी आजाद हिंद सरकार अखंड भारत की सरकार थी, अविभाजित भारत की सरकार थी.
उन्होंने कहा कि बोस ने उस समय ऐसे खुशहाल देश की कल्पना की थी जो अपनी परंपराओं और हर क्षेत्र में विकाश की वजह से जाना जाता.
उन्होंने बांटो और शासन करो की नीति को जड़ से उखाड़ने का वादा किया था लेकिन असलियत में इतने वर्षों बाद भी उनके ये सपने अधूरे हैं.
वहीं इस मौके पर वो क्रांग्रेस पर भी प्रहार करने से नहीं चूके उन्होंने कहा कि एक परिवार को बड़ा बनाने के लिए नेताजी के योगदान को भूलाया गया.

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क्यों हुआ था घटन
साल 1942 में जापान के टोक्यो में रासबिहारी बोस ने ‘आजाद हिंद फौज’ की स्थापना की थी. ‘आजाद हिंद फौज’ (Azad Hind Fauj) की स्थापना का उद्देश्य द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेजों के खिलाफ लड़ना था.
बता दें कि इसकी स्थापना में इंपीरियल जापान, नाजी जर्मनी,  इटली और उनके मित्रों का भी पूरा सहयोग था.
रासबिहारी के बाद सुभाषचंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज की कमान संभाल ली थी. उन्होंने 1943 में टोक्यो रेडियो से घोषणा की, ‘अंग्रेजों से यह आशा करना बिल्कुल व्यर्थ है कि वे स्वयं अपना साम्राज्य छोड़ देंगे, हमें भारत के भीतर और बाहर से स्वतंत्रता के लिए स्वयं संघर्ष करना होगा.’
आजाद हिंद सरकार की खुद की मुद्रा, कोर्ट और सिविल कोड भी था.सुभाष चंद्र बोस का मानना था कि अंग्रेजों के मजबूत शासन को केवल सशस्त्र विद्रोह के जरिए ही चुनौती दी जा सकती है.
1921 में प्रशासनिक सेवा की प्रतिष्ठित नौकरी छोड़कर देश की आजादी की लड़ाई में उतरे सुभाष चंद्र बोस को उनके उग्र विचारों के कारण देश के युवा वर्ग का व्यापक समर्थन मिला.
उन्होंने आजाद हिंद फौज में भर्ती होने वाले नौजवानों को उत्साहित करने के लिए ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा.” का नारा दिया था.
आजाद हिंद सरकार ने देश से बाहर अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी और आजादी की लड़ाई में एक तरह से परोक्ष रूप से अहम भूमिका निंभाई थी.