अंधेरे में डूबे गांवों के लिए प्रेरणा है, उत्तराखंड का सोलर लाइट वाला कस्याली गांव

सोलर
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जो गांव दो वर्ष पहले शाम ढलते ही अंधेरे की आघोष में समा जाता था, आज वह सोलर लाइटों की रोशनी से जगमगा रहा है.
दरअसल, कस्याली गांव को रोशन करने के लिए सोलर ऊर्जा के रूप में जो प्रयोग अजमाया गया था, वह सफल रहा है.
इस गांव मे सोलर लाइट का सफल प्रयोग अंधेरे में खोए हुए सैकड़ों दूरदराज के गांवों के लिए उम्मीद की किरण जैसा बन गया है

गुलदार अंधेरे में करता था हमला

कस्याली गांव में शाम ढलते ही अंधेरा पसर जाता था. इसके बाद इस पहाड़ी क्षेत्र में गुलदारों का घर के पास नजर आना आम बात है.
गांव में अंधेरा होने के कारण गुलदार शाम के सात बजे ही गांव के आस-पास पहुंच जाते थे. यहां तक कि गांव के दो बच्चों को गुलदार अपना निवाला भी बना चुका है.
सोलर लाइट ने बदल दी जिंदगी
उत्तराखंड के यमकेश्वर ब्लॉक के कस्याली गांव में दो साल पहले बिजली की बड़ी समस्या थी. जिसके कारण देर शाम 7 बजे ही सभी के दरवाजों में कुंडा लगा जाता था.
चूंकि गांव सड़क से 3 किलोमीटर की दूरी पर था, और पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण यहां बिजली की व्यवस्था भी नहीं हो पाती.
ऐसे में तत्कालीन क्षेत्रीय विधायक ने वर्ष 2015 के अंत में गांव में सोलर लाइटों के रूप में एक प्रयोग किया. शुरू में हर कोई इस प्रयोग की सफलता को संदेह की नजरों से देखा करते थे.
लेकिन बाद में इन लाइटों ने गांव की जिंदगी बदल दी. गौरतलब है कि पूरे गांव में 12 सोलर लाइटें लगी हैं, जो रातभर जगमगाती रहती है. इसके अलावा अब रोशनी में गांव के लोग डर भी महसूस नहीं करते.

कस्याली गांव एक प्रेरणा

कस्याली गांव उन गांवों के लिए प्रेरणा का काम कर सकता है, जो शाम ढलते ही रोशनी की एक किरण को तरसते हैं.
ऐसे गांव जहां दुर्गम क्षेत्र होने के कारण बिजली का पहुंचना मुश्किल होता है, और रखरखाव की भी कोई व्यवस्था नहीं हो पाती है.
ऐसे में सोलर लाइटें उन सभी गांवों के लिए एक बेहतर विकल्प साबित हो सकती हैं, जहां बिजली का पहुंचना मुश्किल है.

कैसे काम करती हैं सोलर लाइटें

सोलर लाइटें बिना बिजली के काम करती हैं, ये लाइटें खुद सूर्य से मिलने वाली ऊर्जा को अवशोषित कर बैटरी में ऊर्जा का संचय करती हैं.
शाम ढलते ही यह लाइटें स्वयं चालू हो जाती है व सुबह होते ही बंद भी हो जाती हैं. यहां तक कि इनके रख रखाव में भी ज्यादा दिक्कत नहीं होती है.