जलवायु परिवर्तन के प्रकोप से 2050 तक गेहूं, चावल और दूध के लिए तरस जाएगा भारत

Climate Change Effect On Indian Agriculture
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Global Warming Effect On Indian Agriculture: किसानों की आजीविका पर भी बुरा असर पड़ने का संकेत

Global Warming Effect On Indian Agriculture : पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की एक रिपोर्ट ने भारत के भविष्य को लेकर एक बड़ी चिंता जाहिर की है.

इस रिपोर्ट की माने तो अगर जलवायु परिवर्तन को लेकर भारत अब भी सजग नहीं हुआ तो 2050 तक हमारे देश में दूध,गेंहु,आलु और फलों के लिए तरसना पड़ सकता है.
इस रिपोर्ट में फसलों की उत्पादकता कम होने से किसानों की आजीविका पर भी असर पड़ने की आशंका जताई गई है.
बता दें की इस रिपोर्ट को बीजेपी सांसद मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता वाली समिति ने संसद में पेश किया है.
रिपोर्ट में कहा गया है जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसानों का असर दूध के उत्पादन में 2020 तक दिखने लग जाएगा.

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रिपोर्ट के मुताबिक अगले साल तक दूध के उत्पादन में 1.6 मीट्रिक टन की कमी आ सकती है.
जिसमें सर्वाधिक गिरावट उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, राजस्थान और पश्चिम बंगाल के जिलों में देखने को मिलेगी.
रिपोर्ट में दलील दी गयी है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण ये राज्य दिन के समय तेज गर्मी के दायरे में आएंगे जिस कारण पानी की उपलब्धता में गिरावट पशुधन की उत्पादकता पर सीधा असर डालेगी.
फसलों पर भी पड़ेगा बुरा प्रभाव
सिर्फ पशुओं पर ही नहीं ग्लोबल वार्मिंग का सीधा असर देश में होने वाली फसलों पर भी पड़ेगा.
इसका सबसे बुरा असर गेंहु की फसलों पर पड़ेगा जिस वजह से एक अनुमान की मुताबिक इसके उपज में 60 लाख टन तक की गिरावट देखने को मिलेगी .
वहीं 2020 तक चावल के उत्पादन में 4 से 6 फीसदी और आलू में 2.5 की गिरावट दर्ज हो सकती है.
Climate Change Effect On Indian Agriculture
सेब पर भी मंडरा रहा खतरा
पहाड़ी और बर्फीले राज्यों में आय के सबसे बड़े साधन सेब के बगानों पर भी जलवायु परिवर्तन का खतरा मंडरा रहा है .
रिपोर्ट में कहा गया है कि अभी 1230 मीटर की ऊंचाई पर होने वाली सेब की खेती को कुछ सालों में समुद्र तल से 2500 फीट की ऊंचाई पर करनी होगी. क्योंकि आने वाले वक्त में यहां गर्मी बढ़ने से सेब के बाग सूख जाएंगे और खेती ऊंचाई वाली जगह पर स्थानांतरित करनी पड़ेगी.

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इसी तरह उत्तर भारत में जलवायु परिवर्तन के कारण कपास उत्पादन थोड़ा कम होने, जबकि मध्य और दक्षिण भारत में इसके बढ़ोतरी होने की संभावना है.
गौरतलब है की इस रिपोर्ट में समिति ने आने वाले दिनों में इस तरह की चुनौती से निपटने के लिए अनियंत्रित खाद के इस्तेमाल को कम करने और उचित जल प्रबंधन की मदद से सिंचाई के साधन विकसित करने की राय दी है.
साथ ही साथ जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को खेती पर कम करने के लिए किसानों के बीच कम करने और जैविक और जीरो बजट खेती को बढ़ावा देने की सिफारिश की गयी है.